क्या धर्म बुद्धिगम्य है | Kya Dharm Buddhigamya Hai

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Book Image : क्या धर्म बुद्धिगम्य है  - Kya Dharm Buddhigamya Hai
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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घर्म और वेयक्तिक स्वतस्त्रतामैं घर्मकों जोवनके लिए बहुत आवदयक मानता हूं । वह हमारी सुख- शान्तिका सर्वोच्च हेतु है । सुख-शान्तिका अनुभव स्वतन्त्र वातावरणमें हो हो सकता हैं । हम दूसरे राष्ट्र या दूसरी जातिसे ही परतन्त्र नहीं होते, किन्तु अपनी मिथ्या मान्यता और अपने आवेगोंसे भी परतन्त्र होते हैं ।हमारी वैयक्तिक स्वतन्त्रता उतनी ही सुरक्षित होगी, जितने हम घामिक होगें । धर्मसे हमें आत्मानुशासन प्राप्त होता हैं और वह हमारी स्वतन्त्रताका मूल मन्त्र है ।हर सामाजिक मनुष्य भोतिकता और आध्यात्मिकताके संगममें जीता है। भोतिकता जीवनकी भपेक्षा है, उसे छोड़ा नहीं जा सकता । पर वह जोवनका ध्येय नहीं है और होना भी नहीं चाहिए । आध्यात्मिकता जीवन-निर्वाहको अपेक्षा नहीं है पर वह हमारा ध्येय है । हम उस ओर चलते हैं, तब भौतिकता खतरनाक नहीं बनती ।सभी देशों और कालोंमें आध्यात्मिकताका विकास हुआ है । सभी घर्मोने न्यूनाधघिक मात्रामें उसे महत्त्व दिया है। इसीलिए हर धर्ममें अहिसा, सत्य और अपरिप्रहकी चरचा मिलतो है ।साम्प्रदायिकता, रंग-भेद, जातोयता, प्रान्तीयत्ता, राष्ट्रीयता, भाषाबाद आदि दोष, जिनसे मनुष्य-जाति विभक्‍्त हैं, तबतक नष्ट नहीं होंगे, जब- तक घर्म जोवनमें नहीं आयेगा ।अणुब्रत-आन्दोलन इस बातपर बहुत बल देता है कि धर्म उपासना- कालमं हो नहीं, जोवनके हर व्यवहारमें होना चाहिए । मनुष्यका व्यवहार नतिकतासे और नैतिकता आध्यात्मिकतासे प्रभावित होनी चाहिए ।क्या घर्म बुद्धिगम्य है ?




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