हिंदी शब्दसागर | Hindi Sabdha Sagar

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रामचंद्र शुक्ल - Ramchandra Shukla

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रामचन्द्र वर्मा - Ramchandra Verma

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श्यामसुंदर दास - Shyam Sundar Das

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सरपिस तुद पुटपाक लंक ज त रूप रतन जतन जारि कियों है सगांक सो ।--सुख्सी 1 सरघविस-संग्रा सी० [ भं० सर्विस ] (१) नौरुरी । (२) ख़िदमत 1 सेवा । सरपे-संकरा पुं [ अं० सर्वे ] (१) जमीन की पैमाइश । (२) यद सरकारी विभाग जो जमीन की पैमाइश किया फरता है 1 सरसंप्रत-संशा पुं० [ सं० 1] तिघारा थूदर । पत्रगुप्त यूक्ष । सरस-संग। पुं० [ सं० ] [ सी० भर्पा० सरसी ] सरोवर | ताठाव । सरस-बि० [ छं० ] (१) रसयुक्त ! रसीला । (१9 गीला । मीगा। सजख । (श) मो सूसा या मुरझ्ाया न हो । इरा । ताजा 1 (४) सुंदर । मनोहर । (५) मधुर । मीठा । (६) जिसमें भाव जगाने की धन्ति हो । भावपूर्ण । जैसे,--सरस काव्य । ०--निज कर्रिंत केद्ि लाग न नीका ।,सरस हो अयया अनि फीफा ।--उुख्सी । (७) छप्पय छंद के ३५ थें भेद का नाम जिसमें ३६ गुरु, ८० खघु, कुछ 1१६ घर्ण या १५२ मागाएँ दोती हैं । (४) रसिक । सददय । भावुक 1 सरसपु-रंश सी० [ सं० सरखनो, प्रा० मरसई ] सरस्वती नदी या डी । उ०--सरसइ धदा-विचार-प्रचाग ।--तुलसी । रसंक्रा खी० [ से० सरम ] (१) सरसंतता । रसपूर्णता । (२) इरापन 1 तामापन । उ०--तिय निज दविय ज्ू छगी 'घठत पिय ठय रेय खरीद । सूखन देति न सरसई खॉटि खॉटि रत खोट ।--चिद्दारी । सं सी० [ दि० सरसों ] फछ के छोटे अंकुर या दाने जो पदजे , दियाई पहले दें । मैसे,--भाम की सरसई 1 सरसर-वि० एंद्रा पुं० दे “सद्सर” 1 सरसठपघाँ-दि० दे० “सदस्यों ” । सरसना-कि मर [ स० रार्क ना (प्र्य०) |] (१) हरा होना । पनपना । (२) शदि को प्राप्त दोना । थदना । उ०-सुफल होन मन फामना समिटत पियन के ट्रद। गुम सरसत्त यरपत हरप सुमिरत छाल मुइंद । (३) दोधित धोना । सोहना । उ०--वारों थिटोडिये जो मुख एंदू शमी यदद इंदु कहूँ लप सेस मैं । पेनी प्रपीन मदद रगी उि सो परम बहूँ स्पामत केस मैं ।-ऐेणी । ५) रमपर्र होम । (५३ भाव की उमंग से भरना 1 सरसप्तनदि [ गन हू (फ इरा सर । सो सूखा या मुरझापा मे दा | सइर्दाता 1 (२) लीं हरियाली हो । यो पास आप पेइ पीदों में हरा हो । रीसे,--सरसस्त मैदाग 1 सर सर रंग पुर तू सन] (१) जमीन पर रेगने का झाप्द । (२) वापु दे प्प्ते रो उत्पन्न प्यति 1 सैरे, दया सार सर चल रही दे । सदसराना-विष्स+ [ पनुन सर सर हु (% सर सर को प्रति दोगा । (श्) दायु दा गुर भार को ध्दलि बरतें हुए बाइना। त्रेषे 5 सरसेठना चायु का तेजी से _चलना । सनसनाना । उ०--सरसराती हुई हवा केे के पत्तों को दिखाती दै ।--रसायटी । (३ साँप या किसी कीड़े का रंगना । सरसरादट-संज्ञा सी» [ दिं० सम्प्तर न घाइद (प्रत्य०) ] (१) साँप आदि के रेंगने से उत्पन्न ध्वनि । (९५ दारीर पर रेंगनें का सा भनुभव 1 खुजछी । सुरसुराइड 1 (३) णयु पहने का दाब्द सरसरी-वि० [ फा० सरासरी ] (३) जम कर या भरी तरह नहीं । जल्दी में । जैसे,--सरसरी नज़र से देना । (२) 'घरते ढंग पर । काम चलाने भर को । स्थूठ रूप से । मोटे तौर पर । सैसे,-- भमी सरसरी तीर ये कर जाभो । सरसा-संक्ा सी५ [ सं० ] सफेद निसोथ । शुक्क ्रिवता । सरसा(-सहा खी० [ दिं० सरस नशा (फ्रय०) 1 (१% सरसता । (२ शोभा । सुंदरता । (३) अधिकता 1 सरसाना-कि० स० [ हिं० सरसना ] (१) रसपूर्ण करना । (२) हरा भरा करना । & कि म० देन “सरसना” । इनक धर दोमित होना | दोमा देना । समना । उन (क) ठै आए निन भंक में दोगा कह्दी न जाई । सिंमि जठ- निधि की गोद में शशि शिश झम सरसाईँ ।--गोपाल । (व सुंदर सूपी सुगोठ रची विधि कोमछता अभि दी सरसात है ।--इरिभीष । सरसाम -रंदरा पुं० [ शा० ] सप्निपात । प्रिदोप । बाई । सरसार|-पि० [ फा० सररार ] (१) हुआ हुआ । मप्र । (२) गदाप । यूर । मदमस्त । (ने में) सरसिका-रंध सी० [ में ] (१9 दिंगुपय्री । (२) छोटा ता । - (वे यापलो 1 सरसिजनमंश पुं० [ मन ] (११ यद जो वाल में दोता हो । (९ मठ । सरतिज्ञपोनि-एदा पुं० [ से ] बसछ से उत्पन्न, धदय 1 सरसियधद-संश पुं० [ से» ] (सर में डपपघन कमल 1 स्रसी-संद्ा सी [संभ ] (10 ए्ीदा ताल । एटा सरोपर 1 सपा | (९) पुष्करणी । बावली । उ०्-रदुरा बडे दपनहां मो । नपन सुरोंगे सदन सरसी में. 1-- पु 1 (शी पुर दे भू लिसकें प्रदेश चरण में मे, त, मे, शा, ये, ज,र होने दें। सरसीकनरश पुं० [९० ] सास पन्नों सरसी यद-नंदा पुंन [ म० ] (सर में उसपर होनेपाय0 बरस 1 ररसुल गोरंटी-रंटरा सीन हू रेग« ] सरइ रुदसरदा। गत सिटी ! सरसेटना-दि+ स० [ घन ] री रोटी सुनावा । कसा 1 मय चुरा चरम | ड




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