सूर साहित्य नव मूल्यांकन | Soor Sahity Nav Mulyankan
श्रेणी : साहित्य / Literature

लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
16 MB
कुल पष्ठ :
496
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about डॉ. चन्द्रभान रावत - Dr. Chandrabhan Rawat
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श्र सुरसाहित्य : नव सुल्याकन
प्रकृति से परे है । परम तत्व में इच्छा, क्रिया आदि शत्रितयों का निवास हैं !
जगत परमतत्त्व का परिणाम हैं । सृष्टि क्रम में प्रकृति भी स्वीकृत हैं । त्रिगुण
को भी स्वीकार किया गया है । मक्ति पर सभी बल देते हैं । भक्ति के क्षेत्र में
सभी वर्ण, स्त्री, पुरुष समान भधिकार रखते हैं । चर्या (धार्मिक) भोर क्रिया
(मन्दिर आदि का निर्माण) को भी सभी ने स्वीकार किया 1 पारिभाषिक
दाब्दों में मी साम्य हू । बीज, मन्त्र , मुद्रा, न्यास आदि मी हैं । योग की सभी
में चर्चा है । कहने की आवश्यकता नहीं कि भक्ति-संप्रदायों के दर्शन में मी ये
तत्व या इनके संस्कृत रूप स्वीकृत रहे ।
शेवागमों पर आधारित अनेक संप्रदाय थे । दंकराचायें जी ने इनका
भी खंडन किया । लिंगपुराण में पाद्युपतों की एक वैदिक शाखा का भी उल्लेख
है : ये लिंग, रुद्राक्ष और मस्म धारण करते थे । यहीं मिश्र पाशुपातों की भी
चर्चा मिलती है, जो पंचदेवोपासक थे । साघना और प्रतीकों की दृष्टि से
तांत्रिकों को शाखा इन दोनों से भिन्न थी । इनके अतिरिक्त मी अनेक पाशुपत
शाखाएँ थीं जो देश भर में फँली थीं । दशिण में शव-भक्त भी प्रमुख थे ।
इनमें से कुछ महाभारत और पुराणों से भी प्रमावित थे । कइ्मीर में शोव मत
और पूर्वी भारत में शाक्त मत का विशेष प्रचार था । यों भारत के प्रत्येक
गाँव में शिव भीर दक्ति के छोटे-बड़े मन्दिर अनिवायं रूप से मिल जाते हैं ।
२-वेदों को प्रमाण मानने वाले संप्रदाय और वैदिक मूल्य
जिस प्रकार वेद-विरोधी नास्तिक संप्रदायों की वृद्धि हो रही थी, उसी
प्रकार आस्तिक संप्रदायों की संख्या भी बढ़ रही थी । वेद को प्रमाण मानने
वाले सिद्धान्तों में चाहे परस्पर मतंक्य न हो उनमें वेद-प्रामाण्य समान रूप से
स्वीकृत था । समस्त भक्ति संप्रदायों की भी यही स्थिति है । अनेक देव, शाक्त,
पाणुपत, गणपत्य, सौर आदि नामधारी संप्रदाय अपनी प्रतिष्ठा के लिए अपने
को श्र_ति-सम्मत कहने लये ।
दार्शनिक दृष्टि से वेद-वेदान्त के अनेक माष्य प्रस्तुत किये गये । इनके
द्वारा मुल दर्शन का प्रचार मी होता था और मुल दर्शन विकसित भी होता
था । अनेक नवीन तत्त्वों का समावेश भाष्यीं के द्वारा मुल दर्शन में हो जाता
था । साथ ही परिस्थितियों के अनुकूल कुछ विशिष्ट तत्त्वों का पुनराख्यान भी
हो जाता था । इससे दर्दन जीवन्त बना रहता था । 'पुराण' एक दूसरी टी
पद्धति से वेद-वेदान्त-सूत्र -चमंशास्त्र को प्रस्तुत करते थे । वे सूक्ष्म को स्थूल
१. सर जान उडरफ, दादित एण्ड शावत, पु० २३३
User Reviews
No Reviews | Add Yours...