सध्दर्ममंडनम | Sandharbhmandnam

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १ ] मम्यक्‌ ज्ञानके भोद् सपा मोदकी आराधना नहीं दो सकती । इसका कारण यह हैं कि वन्घनसे छूटना मोश है । जब लफ मात्मा अपने असली स्वरूपको, 'मपने चन्थनको; वन्धन के कारणकों, मोक्षके उपायोंको सम्यक प्रकारसे नहीं ज्ञान छेवा तब तक उसे न यतमान, विक्ारमय अवस्थासे झुक्त द्ोनेशी इच्छा दो सकती है सौर न घदद उसके छिपे किसी प्रकारकी प्रदूत्ति ही कर सकता दै। जिस सोमीको यद्द मादम नहीं दै कि में रोगी हु, मैं रोगी हुआ हु; रोगसे मुक्त दोनेके उपाय क्या हैं नीरोगता क्या चीज दै, व अपना रोग मिठानेवी न कमी इच्ठा करेगा और न उसकी प्रदत्ति दी करेगा 1 यही कारण है कि समस्त धर्मों ने सम्यगूज्ञानको अवश्य ही मुक्तिके साधनोंमें प्रधान माना है । ऊपर छूददारण्यकफे उल्डेखम भी यही बात वठाई गई है। चत्दारण्यफ के सिवाय अन्य उपनिपदो्म तथा प्रत्येक दुर्शन शास्नमें भी यददी मान्यता स्त्रीकार की गई है। हु उदाइरण हम नीचे देते देँ, जिससे पिपय स्पष्ट हो जाय । “नायमात्मा वलद्दीनेन छम्यो नच प्रमादात्तपसोबाधप्यर्लिंगातू, , पतैरुपायेर्यतते यस्तु विद्वास्तस्पैप आारमा दिगते प्रहधाम” थर्यात्‌ जिसमें मात्मबठ नहीं दै बद पुम्थ आत्मा ( आात्माफे असली स्वरूप ) फो नहीं पा सकता । न वह आत्मा प्रमादसे, सौर. लिंग ( साघुका मेप ) दीन तपसे ही प्राप्त हो सकता है । हा, जो ज्ञानी बन कर इन एपायोंको आात्मपठ, अप्रमाद, छिंग युक्त हपकों ड छाना है वही. श्रह्मचाम ( माहमाके असढी निवासस्थान ) में प्रेश करता दै | घददारण्यक सौर मुण्डकोपनिपड्फ्रे इन दोनों उल्ठेप्रॉप्ति यदद चिपय साफ समझ में था जाता है कि जो मनुष्य ज्ञान दीन दोकर तपस्या भादि फरता है वे उसके सब कर्म ससारके दी फारण हैं और जो ज्ञान युस्त दोकर इन्दीं तपस्या मादि कमोको करता दै, उठके ये दी कर्म सुक्तिके कारण होते हैं । “यस्त्वविज्ञानचीनू मबसमनस्क सदाइशुचि 1 जन नस तत्पद्माप्नोति ससार चाधिगच्छणि । यस्वुविज्ञाइबान्‌ सबति समनस्क सदाशुचि । सु तत्पट्माप्नोति यस्मादू भूयो न जायते । (पोपए) सर्यात्‌ जो ज्ञानी नहीं दे बद्द ठीक ठीक विचार नहीं कर सकता बौर थद्द सदा अपविन है । वद्द मोशन नहीं पा सकता प्रत्युत ससारमें दी परिश्रमण करता है। जो छप्नी दे चदद ढीक ठीक विदार कर सऊती दै मौर वद सदा पवित्र है। बद ऐसे पदक पाता दै जिससे फिर कभी ब्रापस नहीं ठौटना पड़ता दै।




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