सूक्ति त्रिवेणी भाग - 2 | Sukti Triveni Bhag - 2

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutUpadhyay Amar Muni
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
154
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about उपाध्याय अमर मुनि - Upadhyay Amar Muni
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ह्साए
२६,
२७,
ने,
२४.
३०.
३१.
रेर्,
देर.
दे,
उस्सुरसैय्या परदारसेवा,
वेरप्पसवों च झनत्यता च ।
पापा च मित्ता सुकदरियता च,
एते छ ठाना पुरिसं धघंसयन्ति ॥
निद्दीब्सेवी न च बुद्सेवी,
निहीय॑ते कालपक््खे व चन्दो ।
न दिवा सोप्पसीलेन, रत्तिमुदठानदेस्सिना ।
निच्च॑ मत्त न सोण्डेन, सकका श्रावसितु घर ।
झ्र्तिसीतं श्रतिउण्ह॑ं,. भ्रतिसायमिदं भट्ट ।
इति विस्सट्ठकम्मन्ते, भ्रत्था श्रच्चेन्ति माणबे ॥।
योध सीतं च उण्हं च, तिणा भिय्यो न मज्ञअति ।
कर पुरिसकिच्चानि, सो सुखं न विहायति ॥।
सम्मुखास्स वण्णं॑ भासति ।
परम्मुखास्स भ्वण्णं भासति ।
उपकारकों मित्तो सुहदो पिता,
समानसुखदुक्खो सुहदो वेदितव्वों ।
पण्डितो सीलसंपननों, जल झग्गी व भासति ।
भोगे संहरमानस्स, भमरस्स इरीयतो ।
भोगा संमिचयं यन्ति, वम्मिकोवृपचीयति ।
सूक्ति शिवेससी
-है८।२
न्नू्दें।ठ1२
“एडे।८5।२
नदे।८।1२
ननाडे।5। ९
नन्हे दाह
रे 51४
ने ८1४
ना दे ८1 ढ
User Reviews
No Reviews | Add Yours...