भीष्म पितामाह | Bhisma Pitamah

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Bhisma Pitamah by चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा - Chaturvedi Dwaraka Prasad Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ) ऊन पश्चापाप न करेगा ? सै तो मैं, दनराज इंद्र भी ऐसा उम संबंध कभी नहीं छाड़ेंगे। झतएव कन्था के मंगल के लिये आपसे एक वात कदता हूँ, इसे आप सुनें। इस सबब फे होसे पर झापके साथ शत्रता वैँव जयगी। आप जेे पराननभी शौर तेजस्वी के रद, यदि कोई कितना दी बड़ा बलवान क्यों न दो नह वहुत दिनां तक जीवित सहों रह सकता | सारांश यह कि आपके कुछ दोने प९ किसी का सिस्तार चदीं | इसमें यदी एक बड़ा भारी देष दीख पड़ता है। देवब्रत झट दालराज का झभिपाय समक गए ।. वे जब अपने पिता को प्रसन्न रखने के लिये प्राण तक देने को प्रस्तुत थे तब उनके लिये यह कौन बड़ो बात थी | रत: दासराज के कठोर वचन छुनकर भी उनके सन में तिल भर थी विकार उत्पन्न न हुआ । पिठभक्त देवन्रत ने असामान्य स्वाथेत्याग को परिचय दिया ।. भक्ति श्रौर श्रद्धा ने उनके सन से स्वाये शरीर विषय -वालचा को मार सगाया । साथ श्राए हुए वूठे चत्रिया के सामने देनन्नत से दासराज से कहा देवन्त हे सेम्य ! मेरी सत्य प्रतिज्ञा को सुना । मैं भरतिज्ञा करता हूँ कि पिता को सारी संपत्ति का ध्विकारी सत्यवती के गर्भ से उत्पल बालक होगा । में उसी को कुरुराव्य का उअधिपत्ति शार्चूजा | दासराज सदधन्नत | आप पिता का पच्च लेकर आए दर इसी से आपसे कदना पड़ता है ।. झाप साथ निचोर कर




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