प्राचीन कवियों की काव्य सड़ना | Prachin Kaviyon Ki Kavya Sadhna

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Prachin Kaviyon Ki Kavya Sadhna by राजेन्द्रसिंह गौड़ - Rajendrasingh Gaud

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दर हि संत कोर श्१ (्घं सके सुर का नाम राघवानन्द था । किसी ्नुशासन-सम्पन्घी घिपय पर रर्से सतत दो जाने के कारण वह दाग प्पू दर ट चर धन का दक्षिण सारत में उत्तर भारत चले श्राये । इस ः प्रकार भक्ति के थीज को उत्तर भारत सें लासे का श्रेय स्वामी रामामत्द को प्राप्त हुआ । चद उच्च घाहाणकुल मे उत्पन्न दण थे, संस्द्धन के पीदित थे, प्रमावशाली श्री सम्प्रदाय के भाव रु थे, पर्न्जु स्वतत्र विचारक दोसे के कारण उन्होंने यह ्नुभवद निया कि भगवान का शरणागत दॉकर जो भक्ति के पथ मे श्रा जाता ईै, उसके लिए वर्गश्िम घर्म का बन्घन व्यर्थ है । श्रेष्ठता भक्ति से दौत। £, नन्म ने नहीं । यह सोचकर उन्होंने सब को त्याग दिया श्ौर श्राप से चाएडान तक को रामनाम का उपदेश दिया । वह घचतारवाव से अस्त स्खते थे शरीर चरित्र को ही लोक और कान ये सखिए उपयोगी समकम थे । उपासना के क्षेत्र म वह जाति- पाँति का यन्धन व्यथ समझते थ, पर उन्होंने द्पने शिष्यों पर अपने मत को लादने की चेष्ट नहीं दी । वद्द आ्राकाश-घर्मी थे, शिला-धर्मी- सहीं | बह द्पने शिष्यों को स्वतंत्र वित्वारक बनने का अवसर देते थे। कार पर उनकी स्वातंत्र्य-प्रियता का सधिक प्रभाव पड़ा । श्पने गद्द रामानन्द से बीज रुप से उन्होंने जो ग्रहण किया उसे उन्होंने अपनी रुचि, श्पने सिद्धान्तों के ालोक में प्रसारित किया । उन्होंने एक हीं साथ उत्तर-पूव के लाथ-पथ और सहजयान का मिश्रित रूप, पश्चिम का सूफी सम्प्रदाय श्रौर दक्षिण का वैष्णव-धम--इन तीन बड़ी बड़ी धाराओं को. श्रात्मसात्‌ किया, ' परन्तु इससे उनके रामानन्द के शिष्य होने में कोई बाधा नहीं आई । इससे स्पष्ट है कि कबीर ने रामानन्द का दन्घानुकरण नहीं किया । कबीर श्र रासासन्द दोनों राम? के भक्त थे, पर रामानन्द ने जिस साकार राम? की उपासना की शिक्षा कबीर को दी थी, कबीर ने उस राम” को चिराकार ब्रह्म के रुप में धहण किया । उनके राम निणुण श्र -




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