हमारी नाट्य - साधना | Hamari Natya Sadhana

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नाटक की मूल प्रदत्तियाँ श्रीर उनका मदर ६उषे दमो यदी प्रतीत दोता दै कि दम वास्तविकता को देख रहे हैं | श्रभ्यंकाव्यमें द्रुमो श्रादिका वणन श्रद्वा दोता दैःद्श्य काव्य में श्रमिनय-दाण । इसीलिए दृश्य काव्य, श्रव्य काव्य की श्पेक्ता दधिक श्रौए र्यायी प्रमाव उसने करने में सहायक होता है । भव्य काव्य में केवल श्रवरोन्दिय को झ्ानन्द मिलता है, पर दृश्य काव्य में भवसेन्दरिय क साय-ाय चद्ुरिन्दिय को मौ । चलुरिन्द्रिय का विषय रूप है, इसलिए दृश्य काव्य को रूपक कदना युक्तिसगत ही है । ऐसी दशा में इश्य काव्य रूपक का पर्याय हो जाता है, पर द्रव जो नाटक लिखे जा रहे ई उनमें कविता के श्रमावं के साथ-षाय श्रभिल्यंजना मी काल्य मय नहीं दोती । इसलिए. श्राघुनिक नाटकों को काव्य के द्रन्त्गत रथान देमा उचित नहीं जान पड़ता ! घाधुनिक नाटक मुख्यतः गयमय दोते हैं | इससे स्पष्ट है कि नाटक रौर काव्य) साहित्य के दो मिन्नभिन्न अंगहै शीर उनकी रूप- रेखा एवं उनकी श्रमिव्यंजना-रीलीनादकश्चीर कहीं भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाती । पर इतनी मद्दाकाप्य .. विभिन्नता देते हए मी यह तो मानना शे दोगा कि दोनों सानव-बीवन की ब्याख्या करते हैं ्लौर दोनों काविकास श्रन्तदर्द्र के चित्रण में दोता है । कयानफ की दृष्टि से नाटक की तुलना मद्दाकाव्य से दो सकती है | मददाकाव्य का कयानक नाटक के कथयानर की श्रपेक्षा रथिक विस्तृत होता दै ! महाकाव्य के कथानक के गर्म में श्रनेक छोटी-छोटी माउंगिक कथाशों का समावेश रददतां हैं; नाटकं के कथानक में एकमात्र उन्हीं मदस्वपूर्ण घटनाश्रों तथा परिस्थि- दियों को श्रपनाना पड़वा है जिनके बिना कया का विकाप्ठ ही नहीं हो सऊता । पेखी दशा में किसी मद्दाकाब्य के कथानक को बिना काटनछौर के, नाटक के कथानक के रूप में परियत करना श्रत्यम्त कठिन है । महाकाब्य के विपयों की सीमा मी श्रपेज्ञाकत सीमित है। नायक इति- दास, पुराण, लोकगाथा, समाज, शजनीति, नीति, _ मानव-दशन, च्तेमान-समस्याएँ--इनमें से किसी से भी श्वपनी रचना के लिए सामग्री




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