कलंक | Kalank

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Kalank by राजेश्वर प्रसाद सिंह - Rajeshvar Prasad Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सरल नहीं हो पाता । तुम्हे देखने की श्राज बडी इच्छा हुई, इसलिए सोचा गिरिस्ती का भंकट तो सदा लगा दही रहेगा, चलूं महराजिन दीदी से मिल श्रारऊँ | दरवाजा बन्द करते हुए सुखराजी ने कहा--बरडा श्रच्छा किया; चौधराइन ! राज मुझे भी तुम्हारा बड़ा ,ख्याल आ रहा था | “प्याज तो बडी सफाई है, दीदी ! ऐसा जान पडता है जैसे श्राज ही दिवाली मना रही हो |”? “आज का दिन मेरे लिए दिवाली से बढकर है, चौघराइन !”* “क्यो, कया बात है, दीदी ?”” “प्ाज,..उनकी चिट्ठी श्राई है !”” “किसकी, दीदी !”? मेरे उनकी 1”? *पदुबेजी की १? श्र | पट । 35 “वाह ! तब तो बड़ी ,खुशी की बात है । वाह ! मैं कहती थी कि दुबे ऐसे-बैंसे श्रादमी नहीं हैं, वह तुम्हारी सुध जरूर लेंगे । मेरी बात ठीक निकली कि नहीं १ लाश्रो, सिठाई खिलाश्रो, दीदी |” “खा लेना, चौघराइन |. कान बहुस-सा खाश्रोगी |”? “ही-दी-ही-दी ! मैं हंसी कर रही हूँ, दीदी |”? “यह तो मैं भी समक रही हूँ, चौघराइन ।”” वह रात सुखराजी के लिए. दीपावली से कम न थी ।. उसके घर के तमाम ताकों पर दीपक जल रहे ये । बधाई देने के लिए श्रातुर शुभचिन्तकों का ताँता बेँधा इुश्रा था। सुखराजी के पाँव ज़मीन पर न पढ़ते थे | उसके विजयोल्लास की सीमा न थी | रे वीस साल पहले की बात है। सुखराजी उस समय युवती थी; सुन्दरी थी; श्र उसे इसका ज्ञान श्रौर श्रमिमान था । उसका पत्ति




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