जीवन के सपने | Jeewan Ke Sapne

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Jeewan Ke Sapne by राजेश्वर प्रसाद सिंह - Rajeshvar Prasad Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सिंहासन ^ ` ष “मूता ही सही । मै करती ही जागी यह मूखेता ।” ज़ोर से हँस पड़ी सावित्री । . एक दिस पाठशाला से लौट कर म खत है, बिटिया |” “क्या लिखा है ? “लो देखो 1?” माँ के हाथ से पत्र लेकर पढ़ने लगी सावित्री । “पूज्यनीया बुझा जी, प्रयाम ? | बहुत दिनों से ्रापको पत्र नहीं लिखा । माफ़ी चाहता हं । प्रमोद मेरा एक सित्र है। बड़ा सुशील और सीधा-सादा है, और स्वजातीय भी है । लम्बी बीमारी से उठा है । डाक्टरों ने जल-वायु परिवत्तेन की सलाह दी है । इसलिये उसे आपके पास मेज रहो हूँ कुपया उसे ्पने थहाँ स्थान दीजिएगा छोर उसकी समुन्चित देख-ग्ख कीजिएगा । वहाँ उसके एक रिश्तेदार भी हैं, किसी होटल में भी वह ठद्दर सकता है; लेकिन सेरा ख्याल है, आपके यहा उसे भिना आराम सिलेगा; उतना कहीं न मिल सकेगा । मै जानता दकि आपकी आर्थिकं स्थिति सन्तोषञनक नहीं है और अपने सित्र का भार छापके ऊपर डालना किसी तरद्‌ उचित नहीं । इसलिए ५०) रपये मनीआडंर से मेज रहा हूँ। ले 'लीजिएगा, लोटाइयेगा नहीं । हम सब मजे में हैं। आशा है कि आप शरोर सावित्री भी जसकशल हीगे । ` . आपका आज्ञाकारी “कोशल ` ६} न्न ५. मे क्यः कौशल का




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