सम्पत्ति - शास्त्र | Sampatti Shastra

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Sampatti Shastra by महावीरप्रसाद द्विवेदी - Mahaveerprasad Dvivedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१९ भूमिकी 1 यदि किसी के देष दिया जा सकता है तो उन्हीं को दिया जा सकता हैं जा इस शाख का अच्छा ज्ञान रखकर भी उससे ग्रपन दश-माह्यां का कृच भी लाभ पहुँचाने का यन्न नही करते । जब याम्य जन श्रपने कत्य का पालन करने लगेंगे तब अयोग्यों को उनके सामने कुलम उरान क्रा कभी साहस ही न होगा । जव तक हिन्दी का सीभाग्योदय न हा--जष तक हमारे उच्च शिक्षा प्राप्त सजन हिन्दी को अनादर की दृष्टि से देखना बन्द न करे'--तब तक अल्पज्ञ, भ्रयाग्य, अशिक्षित श्रथवा श्द्धशिसतित लोग, किसी प्रकारं का कहीं से श्रयल्प उत्साह न पाकर थी, यदि हिन्दी में सम्पत्तिशास्त्र की तरह के गहन शाख्रीय विषयों पर लेख लिखने की ढिठाई करें, सा उन पर खड़पाशि होना न्याय्य नहीं । हम जानते है--हमे विश्वास रै, श्रैर पूरा विश्वास है--कि इस पुस्तकं में हमसे अनेक त्रुटियाँ हुई होंगी; इसमें अनेक दाष रह गये होंगे; इसमें प्रनेक बाते' हम कुछ की कुछ लिख गयं होंगे । पर हम उनके लिए समा नही मांगते । श्रपनी श्रयोग्यता को जान कर भी जब हमसे ऐसे काम में हाथ डाला, तब त्मा मांगने से मिल भीता महीं सक्ती । कमाने मागन का एक कारण श्रौर भी है । बह यह कि हमारी त्रटियां से हमारी प्यारी हिन्दी को कुछ लाभ पहुँचसे की आशा है । संभव है, उन्हें दख कर किसी योग्य विद्वान्‌ को हिन्दी पर दया अवे, शरीर उसके उदारहदय में सम्पत्ति- शास पर एक निर्दोष, निर्धान्त श्र निरुपम पुस्तक लिखते की इच्छा उत्पन्न हा । यदि हमारी यह संभावना, कभी किसी समय, फलीभूत है जाय ता हैस समभे गे कि हमारी इस त्रुटिपरिपू्ण पुस्तक ने बदा काम किया । जुद्दी, कानपुर पद १५ दिसम्बर १६०५७ महाबीरप्रसाद्‌ द्विवेदी ।




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