गुप्त धन | Gupt Dhan
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
205
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand):¶७केवल विचार करने के लिए शेप रह गये हैं ।--केवल आचार के
है, विचारों की टकराहट भी जिन्हें टस-से-मस नहीं कर | 1क्या उन माँ जो को भुला सकता हूँ जो त्रपुणः
जिन्होंने मुझे जीविका दी थी और. . जिनकी वदीलत मैं आदमी
यना । इसी घर मे जिन्होंने कचन लुटाया और लुटाया सिर्फ हम
दोन-दुखियों और गरीवों के लिए । कभी जो किसी ने उनसे दस
रुपये मणि, तो एक तो उन्होंने इनकार नहीं किया । दूसरे देते
समय यह् भी कह् दिया--“भौर ज्यादा जरूरत हो, तो कट देना
सकोच न करना ! ;--” हालांकि इसका फन अकसर यही
हुआ कि मांगने वाला जो लेने आया दस, तो ले गया वीस । ऐसी
कितनी माताएं इस दुनिया मे हैं ?फिर पलक भीग उठे है ! फिर आँसू पोंछ लिये उसने । फिर
ध्यान आ गया--चामियों का गुच्छा ? फ़िर उसे उसी जमीन
पर से उठांती हुई कहने लगी थी--“मेरा कुछ नही है । अन्तमे
जब सब कुछ तुम्हदी लोगों को मिलना है, तो अभी वयो न मिले !
फिर, आँखों के आगे की वात और होती है। मरने के वाद क्या
होगा, कौन जानता है!”टप टप टप !ये भाँसू गिर रहे हैं जोधा के, या उसकी पावन आत्मा का
रस झर रहा है !उसे पता नहीं चल सका कि कव गुरुदेव चुपचाप निकट
आकर उसे देखने लगे । फिर उसने गमछे, से आँसो के आँसू पोंछे
और जसे चकते हुए एक ओर देखा ! क
~~ गु.
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