श्री तिलोक शताब्दी अभिनंदन ग्रंथ | Shri Tilok Shatabdi Abhinandan Granth

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Shri Tilok Shatabdi Abhinandan Granth by महेन्द्रकुमार जैन - Mahendrakumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सम्पादकीय-अपने ग्राम वल्लमनगर में मेरे मकान के निकट हौ जेन धर्म स्यानक होनेसेमेग यह्‌ समाम्य ग्हा दै कि मेरे कर्ण-कूहरो को गैणवावम्था मे ही साथफालीन प्रतिकमण के समय पूज्यपाद थ्रीतिलोककषिजी महाराज की शुतिमनुर गेयप्रधान पाँच पदों की वंदना पवित्र करती रही है । उनको इस वदना से आाकपित हो मैने आठ नो वे को अवस्था में ही स्वयं प्रेरणा से सामायिक प्रतिकमण मादि गाधध्यक सूच कठस्थ किये । कुछ अधिक समझ में आने पर वाल्यावस्था में ही मेरे मन में यहू जिज्ञासा हुई कि इस भाव-वदना में सबको आाकपित करनेवाले यह तिछोख रिख ' कोन है? अध्ययनानन्तर समाज से टूर विशाल क्षेत्र में विविध विद्याविपयक प्रवृत्तिमों में रत रहने के कारण शपनी वह जिज्ञामा मस्तिप्क में सस्कार रुप से स्थित थी । अत में इस वर्ष जुलाई महीने के मध्य में उपाध्याय मुनि श्री मानंदकऋषिजी महाराज के दर्शन होनेपर उन्होंने मेरे सामते श्री लिलोक कऋषिजी महाराज का जीवननचरित लिखने का प्रत्ताव रखा । उस ममय आपने प्रस्तुत अभिनदन ग्रय की चर्चा नहीं की थी । इस महा मुनि के प्रति मेरी बचपन से श्रद्धा थ्री। नत्काथ आपके इस प्रस्ताबानुसर कर्य करना प्रारम कर दिया । में अपनी सोजननुयार स्व ० रत्तकऋषिजी महाराज के परिशिग्टवर्ती जीवन चॉरिन की तन्द्र इन ' ऋषि वरेष्य ' का आधूनिक गी में जीवन चरित्र लिखना चाहता था, कितु वदत उहापोह के पन्चात्‌ यमिनदन ग्न्य वर्ती रुप ही निश्चित फ़िया गया । इसे भी में एक विधि का सकेत ही समझना हूँ, क्योकि माज से दस साल पहले मैसुरी में महापडित श्री राहुल साऊत्यायन के साथ कार्य करते समय उनकी प्रेरणा हे बुद्धचर्या' की तरह ' महावीर चर्या छिवने का मैने निधचय फियाथा । बहू कार्पे कुठ प्रारस भी कर दिया था, पर आवद्यक आगम ग्रथों के अभावकै कारण उष आव्य काय को वही स्थगित करना पडा! न मालूम वहु कार्यकय मपर होगा, परउन भमण भगवान्‌ महावीर द्वारा उपदिष्ट पवित्र मयममार्ग को ग्रहण कर पने जोवन को पिर वनानेवाठे इच “चपि पुषत्र ' की'र्या छिलकर धघन्यता का अनुभव करता हूँ । पूज्यपाद श्री तिछोकत्रटपिजी महा-राज का यह जीब्रन-चरित्र, जीवन चरित्र नहीं वरन्‌ श्री तिरोक चर्या' हैं ।आपको इस चर्या में उनकी देनदिनी के अनुसार, प्रत्पक वर्ष का विशिष्ट कार्याविव-रण हैँ । _मालब प्रात य विहार कर विन्न्य एव सातपुद पवत के चीहड चाटों को पार करते हुए जब आप महाराष्ट्र में पघारे उस समय रास्ते में पडनेंद[लो नमदा ओर ताप्ती नदियो का इसमें हूबहू वर्णन हूँ। तमंदा नदी के पुल प्र ऊनी दर्द




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