जैन साहित्य का इतिहास १ | Jain Sahitya Ka Itihas 1

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutKailashchandra Shastri
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
19 MB
कुल पष्ठ :
511
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about कैलाशचंद्र शास्त्री - Kailashchandra Shastri
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)४ : जैनसाहित्यका इतिहासदक्षिणकी तमिल और कलडी भाषामें भी जैन साहित्यं कम नही है । चन्द्र-
गुप्त मौर्यके राज्यकालके अन्तमें श्रुतकेवली भद्रबाहु मगधमें दुभिक्ष पडने पर एक
बड़े साधु-संघके साथ दक्षिणकी ओर चले गये थे । उसके बादसे दक्षिण जैन
संस्कृतिका केन्द्र बन गया और लिंगायतोंके अत्याचारोंके आरम्भ होने तक वहाँ
जैनोंका अच्छा प्रभाव रहा । दिगम्बर परम्पराके अधिकांश प्राचीन ग्रस्थकार
दक्षिणके थे । अतः उन्होंने प्राकृत भर संस्कृतकी तरह कनड़ी और तमिलमें भी
खुब रचनाएँ कीं । अतएव कनड़ी ओर तमिल भाषामें भी प्रचुर जैन साहित्य
उपलब्ध है । इस तरह जैन साहित्य बहुत विस्तृत है ।वर्गीकरण और कालक्रमदिगम्बर और शइ्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके साहित्यमें समस्त जैन साहित्यका *
वर्गीकरण विषयकी दृष्टिसि चार भागोंमें किया है। वे चार विभाग है-प्रथमानुयोग,
करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग । पुराण, चरित आदि. आख्यानग्रन्थ
प्रथमानुयोगमें गर्भित किये गये है । करणशब्दके दो अर्थ हैं--परिणाम और
गणितके सूत्र । अतः खगोल ओर भूगोखका वर्णन करनेवाले तथा जीव और कर्म-
के सम्बन्धे भादिके निरूपक क्म॑निद्धान्त विषयक ग्रन्थ करणानुयोगमे किए गये
है ! आचार-सम्बन्धौ साहित्य चरणानुयोगमे आता है ओर द्रव्य, गुण, पर्याय
आदि वस्तुस्वरूपके प्रतिपादक ग्रन्थ द्रव्यानुयोगमें आते है ।दवेताम्बर परम्पराके अनुसार यह अनुयोग-विभाग आर्यरक्षितमूरिने त्रिया
था । अन्तिम दसपूर्वी आर्यवज्ञजका स्वर्गवास वि० सं० ११४ में हुआ । उसके
बाद आर्यरक्षित हुए । उन्होंने भविष्यमें होनेवाले अल्पबुद्धि शिष्योंका विचार
करके आगमिक साहित्यको चार अनुयोगोंमें विभाजित कर दिया । जैसे, ग्यारह
अंगोंको चरणकरणानुयोगमें समाविष्ट किया, ऋषिभाषितोंका समावेश धर्मकथानु-
योगमें किया, पूर्यपरजञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति आदिको गणितानुयोगमें रखा ओर बारहवें
अंग दष्टिवादको द्रव्यानुयोगमें रखा ।दिगम्बर परम्परामें जिरो प्रथमानुयोग नाम दियाहै उसे ही श्वेताम्बर पर
म्परामें धर्मकथानुयोग कहा हैं और इवे० परम्परामें जिसे गणितानुयोग संज्ञा दी
ग है, उसका समावेश दिगम्बर परम्पराके करणानुयोगमें होता हू ।इस तरह विषयकी दृष्टस जन आगमिक तथा तदनुमारी अन्य साहित्य चार
भागोंपें विभाजित है ।डा० विन्टरनीट्सने लिला है कि यद्यपि जैनधर्म बौद्धघर्मसे प्राचीन है तथापि१. आव० नि० गा० ७६२-७७७ 1
२, हि० ई० किण, भा० २, पृ० ४२६
User Reviews
No Reviews | Add Yours...