धर्म्म और जातीयता | Dharmm Or Jatiyta

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अरविन्द घोष - Arvind Ghosh

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देवनारायण द्विवेदी - Devnarayan Dwivedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पणवी तिपतक “ सष शक्तियाँ प्रवि मोर विकसित दोकर विस्तार झऔर श्रपनी प्रवृत्ति सकल देोनेके क्तिये वथाथं साग ढूंढ रही हैं। कष्टिन-तपस्या, उशाकाश्वा योर शरेषठ-कम, शाक्तिस्फुःरणके लकय हैं। यह झार्य-जाति जिस समय तपस्वी, उन्चाकाक्षी श्रीर मसहत्त कस -अयासी हो जायगी, उस समय समम लेना दोगा कि संसारकी उत्नतिके दिनका झप्सम्स हो पया, श्रव धमः ` विरोधिनी सक्षसी शत्तिकरा नाश श्रौर देव-भाक्तिक्रा पुनस त्थास अनिवार्य हैं । इसलिये इस प्रकारकी शिक्षा भी श्राघ्ुनिक समयके लिये किशिप प्रयालनीय 2 ! युग-धभर' शौर जाति-धम' दीकं रहनेखे जगन्मय ननातन धरम जिंदा किसी प्रकारकी रकाघटके प्रचारित श्रौर अवुषटित होगा |. विधाताने पहलेंसे जो कुछ निरि किया रै नथा जिस सम्बन्ध शविष्योक्तियाँ शास्त्रीम लिखी हैं, वे मां कार्थ-रूपमे परिणत दे जायँगी । सारा संसार आय देशोत्पन्न बह्मन्ञानि्योके समीर क्तास-प्रः ओर शिश्वग्भथी हक मारन भूमिको तीर्थं मानेन अर अपना भस्तक सुकाकर उसका प्रघान्व स्वीकार करेगा! पर वह दिने तमी आवेगः, जब भागत- चासी जागे सौर उनम आयं -भावकः। नवीत्थःन षिण रोषा १ ल




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