प्रणय | Pranay

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
36 MB
कुल पष्ठ :
111
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)नल एणा सुशुक्रयदना रमा गुसकराकार लुप मेहर गयी। संबसक एकने
श्माकों खोदका कहा, कप आवबेरे वीभों ने ?होल्य; मिसक ओर फिलित् चनावदी ऋभके साथू समाने
कहा“ युमलोग सीधस यानचीन को, नहीं नो में यहाँसे, भाग
जाके गी। देखों भई, में हाथ भोइनी है, तुमताग गकेल्यथ
न छेड़ी |हें थी हाथ भोडती हैं भाभी, यनसणा दो, भैया कब '्रावगे ?#ज मानोगी ?। बतलाओंगीरमाकी हृष्टि लज़ाफे भारत ऋुक गयी । उसने मस्यक हिलताकर
च्छ्ा दिया,“-नहीं |/गास्ता यह बलन्लाओं कि. भेयागे। आतेपर मंफे क्या
दोगी ५0रमाकोी झाबसर मिक्ना। बालिकाकी झोत। हट फाफे मुख
कराती हुई बोजी,- गुलाप, फुलकों तर कोमल कोर अत्यन्त
सुन्दर एक वर तुस्कार हि।ए हू दबा ूँगी | वैसे ने ?रमाकी यह बात रुनका हांविद्राहितो कियोंदी थाजका संकु-
, खित हो गयी । विफलित कमल्तितीपर सुपा पढ़े गया। पाठक
समझ गये होंगे कि यह अविदाहिता किशोर, रमाक्ी नमेंदर साधा है |रमाका दिला बढ़ी बह कि कुछ क्राना की , चादवी थी
कि, 'इततेमें वहाँ सास झा गयी । माँकों देखने ही सरलता बहाँसे१३
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