प्रणय | Pranay

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : प्रणय  - Pranay
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about देवनारायण द्विवेदी - Devnarayan Dwivedi

Add Infomation AboutDevnarayan Dwivedi

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
नल एणा सुशुक्रयदना रमा गुसकराकार लुप मेहर गयी। संबसक एकने श्माकों खोदका कहा, कप आवबेरे वीभों ने ?होल्य; मिसक ओर फिलित्‌ चनावदी ऋभके साथू समाने कहा“ युमलोग सीधस यानचीन को, नहीं नो में यहाँसे, भाग जाके गी। देखों भई, में हाथ भोइनी है, तुमताग गकेल्यथ न छेड़ी |हें थी हाथ भोडती हैं भाभी, यनसणा दो, भैया कब '्रावगे ?#ज मानोगी ?। बतलाओंगीरमाकी हृष्टि लज़ाफे भारत ऋुक गयी । उसने मस्यक हिलताकर च्छ्ा दिया,“-नहीं |/गास्ता यह बलन्लाओं कि. भेयागे। आतेपर मंफे क्‍या दोगी ५0रमाकोी झाबसर मिक्ना। बालिकाकी झोत। हट फाफे मुख कराती हुई बोजी,- गुलाप, फुलकों तर कोमल कोर अत्यन्त सुन्दर एक वर तुस्कार हि।ए हू दबा ूँगी | वैसे ने ?रमाकी यह बात रुनका हांविद्राहितो कियोंदी थाजका संकु- , खित हो गयी । विफलित कमल्तितीपर सुपा पढ़े गया। पाठक समझ गये होंगे कि यह अविदाहिता किशोर, रमाक्ी नमेंदर साधा है |रमाका दिला बढ़ी बह कि कुछ क्राना की , चादवी थी कि, 'इततेमें वहाँ सास झा गयी । माँकों देखने ही सरलता बहाँसे१३




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now