गद्य प्रसुन्न | Gadya Prasunn

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रामायण महाकब्यों मे देश-विजय, शत्रु-संद्दार, दो प्रबल प्रतिद्रन्द्रियों के प्रचण्ड घात-प्रतिघात, श्यादि सारे ब्यापार श और उद्दीपन जद नके सचारक होते हैं । किन्तु रामायण की महिसा राम-रावस के युद्ध से नहीं है, यह युद्ध-घटना राम झौर सीता की 'दाम्पुत्य- [पति को उज्ज्वल बनाने के लिए उपलब्धय मात्र है । पिता के प्रति पुत्र की वश्यता, भाई के लिए भाई का श्रात्मत्याग, पत्ति-पत्नी मे परस्पर की निष्ठा ्रौर प्रजा के प्रति राज। का कतव्य कहाँ तक पहुँच सकता है, यही रामायण मे दिखलाया गया है । इस प्रकार 'प्रधानत. व्यक्ति विशेष के गृह-चरित्र किसी भी देश के महाकाव्य मे इस प्रकार वणैनीय विषय नहीं समझे गये हैं । इससे केवल कवि का ही परिचय नहीं होता, भारतवर्ष का भी परिचय होता है ' भारत मे गृह श्रौर गरह-धम का कितना महत्व है, यह्‌ इसी से सममा जा सकता है । हमारे देश मे गारहस्थ्य-धर्य सब से ऊँचा था, इस बात को ग्रह कान्य प्रमित करता है ( गृहस्थाश्रम हमारे निज के सुख ऋऽ सुविधा के लिए नहीं था; वह्‌ सारे समाज को धारण किये रहता था ओर मलुष्य को यथार्थतः ` मनुष्य नाये रखता था । गृहाश्रम भारतीय चराय समाज की भित्ति है चौर रामायण उसी का महाकान्य । रामायण ने उस गृहाश्रम को , विसदृश अवस्था में डालकर नव सके दु खसेगोरान्वित किया ' है। सन्थरा और के केयी के कुटिलें कुच के कठिन आघात से अयोध्या का राजगृह दुरवस्थापन्न दौ गया था, तथापि गृह धर्म! ज्यों का त्यो दृढ़ बना रददा था और इसी गृद-घम की दुभय दृट्ता




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