कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास | Kamyunist Partiy ka Itihas

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Kamyunist Partiy ka Itihas by रामविलास शर्मा - Ramvilas Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कम्युनिस्ट पार्टीका इतिदास यह एक आधुनिक सर्वेहारा-वर्ग था जो दास-प्रथाके युगमें कारखानोंमें/ काम करते-: वाले मजदूरों तथा और छोटे-मोटे उद्योग-पंघोमिं काम करनेवाले मज़दूरोंति एक्स. भिन्न था । यह इसलियि कि बड़े-बड़े कारखानोंमिं काम करनेवाले मज़दूरोंमें एकताकी भाविना थी और उनमें विशेष क्रांतिकारी गुण थे | १५ वीं सदीके ऊंतिम दशकमें इस टरत औद्योगिक उन्नतिका कारण रेलवे लाइनों का, निर्माण था । इस अवधि २१,००० वर्स्ट ( लगभग १४,००० मील-सं. ) से ऊपर रेलवे काशने बनायी गयीं । रेड बनाते समय इंजनों, डब्वों और रेलकी पटरियोंके छिये लोहेकी जरूरत हुई और लोहेके साथ ज़्यादा ईंधन, पानी, तेल और कोयलेकी सौंग हुई । इस मौगिकों पूरा करनेके लिये थातु और ईंधन संवन्धी उद्योग-धन्धोंका विंकास हुआ । .... अन्य पूँजीवादी देशोंकी तरह रूसमें भी औद्योगिक विकासके वादे छासका युग आया जिससे मजदूरोंको भारी हानि सहनी पड़ी और सैकड़ों मजदूर बेरोजगार और बेघरवार होकर इधर-उधर भटकने लगे । ः दास-अ्रथाका अत होनेके बाद रूसमें पूँजीवादका विकास यद्यपि काफ़ी तेजीसे हुआ, फिर भी आर्थिक विकासमें रूस दूसरे पूँजीवादी देशोंसे काफ़ी पिछड़ा रहा । अधिकांश जनता अब भी किसानी करती थी । लेनिनने अपने प्रसिद्ध यंथ “” रूसमें पूँजीवादका विकास ”' में, १८९७ की जन-गणनासे ऑकड़े देकर यह दिखाया था कि संपूर्ण जनताका लगभग ५/६ भांग फिसानीमें लगा था. और केवल १/९. साग छोटे-वढ़े और न्यापारमें तथा छकड़ी या पानीकें काममें, या रेल या राजगीरी या और ऐसे ही कामोंमें लगा हुआ था 1 , इससे स्पष्ट है कि रूसमें यबपि पूँजीवादका विकास हो रहा था, फिर भी वह एक कषि-प्रधान और आ्थिक दृष्टिसि पिछड़ा हुआ देश था | उसमें मध्य-वरौकी प्रधानता थी रूसमें अब भी उस छृषि-व्यवस्थाकी प्रधानता थी जिसमें किसान अपने छोटे- छोटे जोतते-वीते थे, जिससे उन्हें बहुत कम आय होती थी । नगरोंकें अतिरिक्त गावोमिं भी पूँजीवादका विकास हो रहा था । क्रांतिसि पहलेके रूसमें जनताका सबसे वड़ा वर्ग, किसान-वर्ग छिन्न-सिन्न हो रहा था । खाते-पीते किसानों में से कुलक या धनी किसानोंकी श्रेणी वन रही थी जो देहाती पूँजीवादियोंकी श्रेणी थी 1 दूसरी भर बहुतसे किसान तयाह हो रहे थे तथा रारीव किसानों ओर सहारा और अर्द्ध-सर्वह्ारा किसानींकी संख्या वरावर यढ़ रही थी । इन दोनों शरणियोंके वीन्वके किसानों अर्थात्‌ मझोलेकी संख्या प्रतिवर्ष घटती जाती थी । १९०३ से रूममें लगसग एक करोड़ किसान कुडंव थे । ” गांचके ग़रीयोंसे ”# नामक अपनी पुस्तिका लेनिनने हिसाव लगाया था कि इनमें कमसे कम पेंतीस छाख कुर्डब ऐसे थे जिनके पास घोड़े थे दी नहीं । ये डुड्ेव सबसे रारीव क्सानोंके थे जो चहुधा अपनी भूमिकें कुछ हिस्तेम खेती करते थे और झेप धनी किसानोंको उठा _ के हिन्दी संस्करण जन-प्रकाशन गृहसे सिल सकता है ।--र्स, १७




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