अध्यात्म - अमृत - कलश | Adhyatm - Amrit - Kalash

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Adhyatm - Amrit - Kalash by जगन्मोहनलाल सिद्धान्तशास्त्री - Jaganmohanlal siddhantshastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रकिकर्थन ११ समयको योग्यतासे होती है तथापि उन पर्यायोमें परकी अनुक्ता निमित्त होती है 1 उस कर्मोदय रूप अनुकूल निमित्तका अवलम्बन कर, जीव अपनेमें विकारी पर्याय उत्पन्न करता है, यह्‌ उसका विपरीत पुरुषा्थ है । निमित्त विकार उत्पन्न करता है यह कथन, उपचरित कथन, व्यवहारनयका कथन है । उक्त विषयमे पञ्चास्तिकाय ओर उसकी टीकामे जो कुछ कहा गया है उसे यहाँ दे देना उचित होगा-- गाथा ५९८ की टीकामें अमृतचन्द्र जी लिखते हैं-- अथवा उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम रूप चार अवस्थाएं द्रव्य कर्मोकी ही हैं। जोवकी अवस्था तो मात्र एक परिणामरूप ही है। इसलिए उदय आदिके द्वारा . होनेवाले आत्माके भावोौका निमित्तमात्र भूत उस प्रकारकी अवस्था रूपसे स्वयं रिणसित होनेके कारण द्रव्य कमं भी व्यवहारनयसे आत्माके भावोका कर्ता कहा जाता है । इसपरसे भाचार्य कुन्दकुन्दने ही यह पूर्वपक्ष उपस्थित किया--यदि औदयिक आदि रूप जीवका भाव कमंके द्वारा किया जाता हैं तो जीव उसका कर्ता नहीं हूं। किन्तु जीवका अकर्तापना इष्ट नहीं हं । तव पारिशेष्यसे जीवकों द्रव्य कमंका कर्ता पना प्राप्त होता ह । किन्तु वहु केसे हो सकता हँ, क्योकि निश्वय नयसे आत्मा अपने भावको छोडकर अत्य कुक भी नहीं करता ? इस पूवंपक्षके उत्तरमे सिद्धान्तपक्ष उपस्थित्त करते हुए आचायं कहते है व्यवहारसे निमित्तमात्र होनेसे जौव भावका कमं कर्ता है ओर कमंका भी जीव भाव कर्ता हे । किन्तु निङ्चयसे न जीव भावोका कमं कर्ता हं ओर न केम॑का कर्ता जीव भाव है किन्तु वे कन्तक विना भी नहीं होते अत्तः निस्चयसे जीवके भावोका कर्ता जीव हं और कमंभावका कर्ता कमं है । इस तरह निइ्चयसे जीव अपने भावोंका कर्ता और पुद्गल कर्मोका अकर्ता ह यह्‌ जिनागम ह्‌ । समयसारके कतुं कर्माधिकारमे इसीका विवेचन ह, ओर मोक्षमागंकी दुष्टिमे उसका विशेष महत्व ह । जव जोव ओर अजीव स्वतंत्र द्रव्य हैँ तव उनका सम्बन्ध ओर बन्ध पर्याय कैसे होती हे गौर वह्‌ कैसे मिती हँ यह्‌ मुख्य भरन हं । इसका उत्तर इसो अधिकारमे हू । जीकक्े परिणामका निमित्त पाकर पुद्गरू कमं व्गंणाए कर्म रूपमे परिणमन करती है भौर पुद्गल कमके उदयका निमित्त पाकर जीवके परि णाम होते है । यह्‌ सिद्धान्त सवंमान्य है । फिर भी जीव ओौर पुद्गलमे परस्परमं कर्ता कर्म भाव्‌ नहींहै) क्योंकि न तो जीव कमंके युणोंको करता है और न कम जीवक गुणोको करता है । किन्तु उन दोनोमे निमित्त नेमित्तिकपना होनेसे परिणाम होता है । दोनोमे निमित्त नैमित्तिक भाव मात्रका निषेध नहीं है क्योकि परस्परे निमित्त- मात्र होनेसे हौ दोनोका परिणाम होता है । इस निमित्त नेमित्तिकं सम्बन्ध के कारण व्यवहार नयसे जीव पुद्गल कमंका कर्ता भोक्ता भौर पुद्गल जीव ावका कर्ता कटा जाता है । परमा्थेमें जीव न तो पुदगल कमंको करता है और न पुद्गल कनको जे




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