सूर - पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य | Soor Poorv Brajabhasha Aur Uska Sahity

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Soor Poorv Brajabhasha Aur Uska Sahity by शिवप्रसाद सिंह - Shivprasad Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रास्तात्तिक ६९. विक्रमे की सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वाइ में ब्रजभापा में अन्त उचक्रोटि के साहित्य का निर्माण हुआ । ऐसा समभा जाता हैं कि केयठ पचास वधो म इस मापा ने अपने साहित्य की उत्कृठता, मधुरता और प्रगल्भता के बर पर उत्तर भारत की सर्वश्रेष्ठ भाषा का स्थान प्रदण कर लिया । मक्ति-आन्दोलन की प्रमुख भाषा के रूप में उसका प्रभाव समूचे देश में स्थापित दो गया और शुजरात से बंगाल तक के विभिन्न माषा-भाषियों ने इसे 'पुसपो्तम- मापा” के रूप में अपनाया तथा इसमे काव्य प्रणयन्‌ का प्रयत्न भी क्या] एक भर महाप्रसु वज्लमाचार्य ने इसे पुरुपोत्तम भाषा की आदरास्पद संज्ञा दी क्योंकि यह उनके आराष्य देव कृष्ण की जन्म-भूमि की भाषा थी, दूसरी ओर काव्य और सादित्य के प्रेमी सददयों ने इसे ध्माप्रामसिः की प्रतिष्ठा प्रदान की । डा ० ग्रियर्सन ने हिन्दी के अभिजात साहित्य के माध्यम के रूप में प्रतिद्ठित इस भाषा को प्रधानतम बोली { 131९6105 72661४३ ) कहा है ¡ इसे रे, '्मण्प्तए) की, स्पा माय, मामे, ‰ ' टाप चे चपिपे। क) एषमाथे, च सैष यो सौन्दर्य अप्रतिम था । उनके संगीतमय पदों से आइए होकर सम्राट्‌ अकर इस्र मापा के भक्त दो गए | डा० चाइय्यी ने इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि श्वाचरके सदश एक विदेशी विजेता के दिये जो भाषा केवल मनोर॑जन और सादित्विक सौत्सुस्य का प्रयोग- मात्र थी चद्दी उसके भारतोयकृत पौन सम्राट अकबर के काल तक पूर्णतया प्रचछित स्वामात्रिक ५ 7६15 > ज्प् ण प्रप्ता पडत प [षट्कपालं ०६४ तागा एप्यठत्‌ २0तें 15 ९१८८ ८०य८510हप्श्व ४० 1 6 तायात८१०5 हत्त्पड कपत ऋक सही < पठण्डाचदर्ट्त्‌ 25 ४४621 ०६ 30121 [-रण्प्ञहः 08 ४6 3१० दण 12१० ^ क४सण ए लाणड८प1्5, ए 10




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