सूर - पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य | Soor Poorv Brajabhasha Aur Uska Sahity

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Soor Poorv Brajabhasha Aur Uska Sahity by शिवप्रसाद सिंह - Shivprasad Singh

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about शिवप्रसाद सिंह - Shivprasad Singh

Add Infomation AboutShivprasad Singh

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
प्रास्तात्तिक ६९. विक्रमे की सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वाइ में ब्रजभापा में अन्त उचक्रोटि के साहित्य का निर्माण हुआ । ऐसा समभा जाता हैं कि केयठ पचास वधो म इस मापा ने अपने साहित्य की उत्कृठता, मधुरता और प्रगल्भता के बर पर उत्तर भारत की सर्वश्रेष्ठ भाषा का स्थान प्रदण कर लिया । मक्ति-आन्दोलन की प्रमुख भाषा के रूप में उसका प्रभाव समूचे देश में स्थापित दो गया और शुजरात से बंगाल तक के विभिन्न माषा-भाषियों ने इसे 'पुसपो्तम- मापा” के रूप में अपनाया तथा इसमे काव्य प्रणयन्‌ का प्रयत्न भी क्या] एक भर महाप्रसु वज्लमाचार्य ने इसे पुरुपोत्तम भाषा की आदरास्पद संज्ञा दी क्योंकि यह उनके आराष्य देव कृष्ण की जन्म-भूमि की भाषा थी, दूसरी ओर काव्य और सादित्य के प्रेमी सददयों ने इसे ध्माप्रामसिः की प्रतिष्ठा प्रदान की । डा ० ग्रियर्सन ने हिन्दी के अभिजात साहित्य के माध्यम के रूप में प्रतिद्ठित इस भाषा को प्रधानतम बोली { 131९6105 72661४३ ) कहा है ¡ इसे रे, '्मण्प्तए) की, स्पा माय, मामे, ‰ ' टाप चे चपिपे। क) एषमाथे, च सैष यो सौन्दर्य अप्रतिम था । उनके संगीतमय पदों से आइए होकर सम्राट्‌ अकर इस्र मापा के भक्त दो गए | डा० चाइय्यी ने इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि श्वाचरके सदश एक विदेशी विजेता के दिये जो भाषा केवल मनोर॑जन और सादित्विक सौत्सुस्य का प्रयोग- मात्र थी चद्दी उसके भारतोयकृत पौन सम्राट अकबर के काल तक पूर्णतया प्रचछित स्वामात्रिक ५ 7६15 > ज्प् ण प्रप्ता पडत प [षट्कपालं ०६४ तागा एप्यठत्‌ २0तें 15 ९१८८ ८०य८510हप्श्व ४० 1 6 तायात८१०5 हत्त्पड कपत ऋक सही < पठण्डाचदर्ट्त्‌ 25 ४४621 ०६ 30121 [-रण्प्ञहः 08 ४6 3१० दण 12१० ^ क४सण ए लाणड८प1्5, ए 10




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now