अच्युत | Achyut

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| १९ 1] १ ०७ १।१।५ ) सटः किया गया है । शङ्कर कहते हैं ( ब्र० सू० २३५३ ) कि उपव्ने अपनी मीमांसावृत्तिमें कहीं-कहींपर शारीरकसूत्रपर छिखी गई बृत्तिकी बातोंका उछेख किया है। ये उपवर्षाचार्य शबरस्वामीसे पहले थे, इसमें कोई सन्देह नहीं है। परन्तु कृष्णदेवनिर्मित तन्त्रचूड़ामणिनामक न्थ छा हैं कि शाबरमाष्यके ऊपर उपबषेकी एक वृत्ति थी ( द्रष्टव्य-- सट ९00 21] का बनाया हुआ 6४ ६० 58050 रिप!0509],' 9. 167) | कृष्णदेवके वचनका कोई मूल है या नही, यह कहना कठिन है | यदि उनका वचन प्रामाणिक माना जाय, तो इस उपवषे को प्राचीन उपवरषसे भिन्न मानना पड़ेगा | बाधायन-- प्रसिद्ध है कि श्रह्यूनपर बोधायनकी एक व्रत्ति थी, जिससे चायं रामामुजने अपने भाष्ये वचनोका उद्धार क्रिया है ( द्रष्टन्य--580767 8००४5 ण ५6 ८85४ अन्धमाखमे शीबोङ्खित वेदान्तशाङ्करभाष्यानुवादभूमिका; प्र० २१ )। प्रसिद्ध जमन पण्डित 11617120 [2८01 कृ] मत हे कि बोधायनने मीमांसा- सूत्रपर भी दृत्ति ङ्िी थी (्रष्टव्य-]0प'९] ०7 1116 &ाला1680 (1161108. 30५16४४, 1911, 7. 17 ) | प्रपन्चहूदयनामक प्रन्थसे भी यह बात सिद्ध होती है और प्रतीत होता है कि बोधायननिर्मित वेदान्तवृत्तिका नाम कतकोरिः था ( द्रष्टव्य--1 19271479 से प्रकाशित श्रपश्चहुदय,, प्र° ३९ ) | ब्रह्मनन्दा-- पराचीनकाख्मं एकं तरेदाम्ताचायं 'व्रहमनन्दी' तामसे भी जविभूत इए ये । इनका मत मधुसूदनप्ररस्वतीने सक्षेपयारीरककी रीक्रमे ( ३-२१५ ) उद्धृत किया है । इससे अनुमान किया जा सकता है कि शायद ये भी अद्वैतवेदान्तके आचाय रहे होगे | प्राचीन वेदान्तसाहिस्यमे श्रक्षनन्दी' छान्दोभ्यवाक्यकारके अथवा केवरु वाक्यकारके नामसे प्रसिद्ध थे । रङ्क-- शीवेष्णवसम्परदायके साहित्यमे - भी एक ॒वाक्युकारका पता ठगता है । उनका नाम “ठड' है । विड्रिष्टादिती छोग ब्रह्मनन्दी ओर रङ्को अभिन्नं समश्षते हर परन्तु यह कहाँ तक सत्य है, यदद कहना कठिन है ।




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