श्री जवाहिर - किरणावली | Shri Javahir Kiranavali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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| (१३) = (४ कि. ५ न्यायत ‹ : शषा कि पहले का ना चुका है, पेठ साव तदा न्याय-नीति मैं ही धनोपार्नन करते थे । यही कारण है कि श्रापका निनी नवन्‌ “ ना उस्नल रहा दै, व्यावसायिक नीवन भी उतना ही उन्न छा है | आपने श्रपने भीवन की कच्ची उम्र में अर्थात्‌ १५. वर्ष की श्रा मे व्यापार करना श्रारम्म किया था श्रौर लगातार कव वाही वरे तक श्राप व्यापारो नीबन बिताया । इते दी पारकि जीवने, यह श्राय को वात दै करि किसी मौ वष भापको घाटा नहं उठाना पडा | वीवी सदी पे, भब सरे सतार $ बना एकक हो रहे हैं, किली भी देश की एक घटना का पो पपार के व्यवसाय पर प्रभाव पढ़े बिना नही रहता, , शौर नव कि व्यापार के प्रधान सूत्र विदेशियों के हाथों में रहते हैं, इतनी , ता के साथ चालीस वर्ष तक व्यापार करना क्या साधारण व्यक्ति व-ूते की बात है 1 निनदे इ सफलता के लिए असाधारण तिमा एतदो की श्रावस्यकता है । सेठ साइब न किसी मारक विद्यालय पेये शरीर न उन्न कमं कालेन के द्वार खठखटाये थे फिर भौ जन्मजात बुद्धिकौशरर के धल पर देसी शर्ाषारण सफ प्रात की थी ] इस व्यापारिक सफलता में नहा उनकी प्राकृतिक प्रतिमा का पमार दिखलाई पड़ता हे बहा उनकी नीति-गि्ठता मी कारणमूत । साधारण तौर पर्‌ यह-सममा नाता है करि नीप शरोर श्रनीति * का विचार अथवा धर्म-अषमे का खयाल घर्मस्थानकों की वत्तु हैं )




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