श्री जवाहिर - किरणावली | Shri Javahir Kiranavali

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
374
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)|(१३)= (४ कि. ५ न्यायत
‹ : शषा कि पहले का ना चुका है, पेठ साव तदा न्याय-नीति
मैं ही धनोपार्नन करते थे । यही कारण है कि श्रापका निनी नवन्“ ना उस्नल रहा दै, व्यावसायिक नीवन भी उतना ही उन्नछा है | आपने श्रपने भीवन की कच्ची उम्र में अर्थात् १५. वर्ष
की श्रा मे व्यापार करना श्रारम्म किया था श्रौर लगातार
कव वाही वरे तक श्राप व्यापारो नीबन बिताया । इते दी
पारकि जीवने, यह श्राय को वात दै करि किसी मौ वष
भापको घाटा नहं उठाना पडा | वीवी सदी पे, भब सरे सतार
$ बना एकक हो रहे हैं, किली भी देश की एक घटना कापो पपार के व्यवसाय पर प्रभाव पढ़े बिना नही रहता, , शौर नवकि व्यापार के प्रधान सूत्र विदेशियों के हाथों में रहते हैं, इतनी
, ता के साथ चालीस वर्ष तक व्यापार करना क्या साधारण व्यक्तिव-ूते की बात है 1 निनदे इ सफलता के लिए असाधारण
तिमा एतदो की श्रावस्यकता है । सेठ साइब न किसी
मारक विद्यालय पेये शरीर न उन्न कमं कालेन
के द्वार खठखटाये थे फिर भौ जन्मजात बुद्धिकौशरर के धल पर देसी
शर्ाषारण सफ प्रात की थी ]इस व्यापारिक सफलता में नहा उनकी प्राकृतिक प्रतिमा का
पमार दिखलाई पड़ता हे बहा उनकी नीति-गि्ठता मी कारणमूत
। साधारण तौर पर् यह-सममा नाता है करि नीप शरोर श्रनीति *
का विचार अथवा धर्म-अषमे का खयाल घर्मस्थानकों की वत्तु हैं )
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