ग्रहण लगा तथा अन्य राष्ट्रीय कविताएं | Grahan Laga Tatha Anya Rashtriy Kavitayen

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Grahan Laga Tatha Anya Rashtriy Kavitayen  by कमलेश - Kamalesh

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about कमलेश - Kamalesh

Add Infomation AboutKamalesh

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
पा | प, षी माँ, छेड़ो श्रपनी वीणा फिर एक बार गूँज उठे जल-थल-ध्रम्बर अपार लेकिन, यह राग हो अपने आप में तूफ़ान, ताज्जुब से देखे दुनिया-जहान, शत्रु की हिम्मत हो पस्त, वहु लगे जैसे कोई तारा श्रस्त। ग्रौर, जीवन हो निवरा, सिम ढला सोना जैसे श्रभी-श्रभीहो च से तपकर निकला यह चीन, यह चाऊ-एन-लाई, जिनको हमने कभी समा था भाई जिन पर विश्वास केर ` हमने गंवा दी जिन्दगी की सारी कमाई, म्रा जाय होश मे, समभ क्या सुखा, क्या नमी, दोस्ती को समभ दोस्ती, ` ग्राद्मी को जाने आदमी। श्रालिर वि




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now