हिन्दी - जैन - साहित्य - परिशीलन | Hindi - jain - sahitya - parisheelan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दार्निक आधार २५ प्रादुर्माव हो जानेपर आत्मा स्वोन्मुखरूपसे प्रदत्त करती है, जिससे राग- देषके सस्कार शिथिल और शीण होने लगते है तथा रत्नचयके परिपूर्ण होनेपर आत्मा परमात्मा अवस्थाकों प्राप्त हो जाती है। अतः आत्म-गोघनमें सम्यक्‌ श्रद्धा और सम्यस्ानके साथ सदाचारका सहत्वपूर्ण स्थान है । जैन-सदान्वार अहिंसा, सत्य, अचौर्य, श्रह्मचर्य और अपरिग्रह रूप है । इम पॉँचो श्रठोसे अदिंसाका विशेष स्थान है, अवदेप चारो अहिंसा विभिन्न रुप हैं । कपाय और प्रमाद--असावधानीसे किसी जीवकों कष्ट पहुँचाना या प्राणघात करना हिंसा है; इस दिंसाको न करना अहिसा है । मूलतः हिसाके दो मेद है--द्रव्यहिसि और भावदिसा। किसीको मारे या सतानेके भाव होना भावहिंसा और किसीको मारना या सताना द्रन्यहिसा है । भार्वोके कछपित होनेपर प्राणघातके अमावमें भी हिंसा-दोष लगता है । अदिसाकी सीमा ग्रहस्थ और मुनि--साधुकी दृष्टिसे मिन्न-भिन्न है । गृहस्यकी हिसा चार प्रकारकी होती है--संकव्पी, आरम्मी, उद्योगी और विरोधी । बिना अपराघके जान-वूझकर किसी जीवका वध करना सकत्पी हिंसा है । इसका दूसरा नाम आक्रमणात्मक दिसा भी है ! प्रत्येक ग्रहस्थ- को इस दिसाका त्याग करना आवश्यक है । सावधानी रखते हुए भी भोजन बनाने, जल भरने, कूटने-पीसने आदि आरम्भ-जनित कार्यम होनेवाटी दिखा आरम्भी; जीबन-निर्वाहफे दिए खेती, व्यापार, शिख आदि कायोमे दोनेवाली हिंसा उद्योगी एवं अपनी या प्रकी राके ङण होने- “चाठी हिंसा विरोधी कही जाती है । ये तीनों प्रकारकी हिंसाएँ' र्षणात्मक हैं। इनका मी यथाशक्ति त्याग करना साधकके टिए आवश्यक है । शस्यं जियो ओर अन्यको जीने दोः इस सिद्धान्त वाक्यका खदा पालन करना सुख-शान्तिका कारण है। राग, देप, इणा, मोह, ईष्यां आदि विकार हिंसामें परिगणित है ! जैनधर्मक परवर्तकोने वि्ारोको अहिखक वनानेके छिए, स्याद्ाद-विचार समन्वयका निरूपण किया ह ! यह सिद्धात आपसी मतमेद अथवा पभपात-




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