जैनधर्म | Jainadharm

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Jainadharm by मुनि श्री सुशीलकुमार शास्त्री - Muni Shri Sushilkumar Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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होकर स्वरूप पर खड़ा होता, सत्य और तत्व पर आधारित होता । वस्तुत: स्वरूप से समस्त धमं एक है । ं भगवान्‌ महावीर ने अपने युग के तीन-सौ-त्रेसठ धर्मों को वर्णन किया है, जिनमें कुछ क्रियावादी और कुछ विनयवादी एवं कुछ भ्रज्ञानवादी सम्प्रदायें थीं । पर उनमें समन्वय नहीं था, यही. एक सबसे बड़ी भूल. रही है कि धर्म के एक पक्ष पर हम बल दे देते हैं और दूसरे पक्ष से हम पीछे रह जाते हैं । इती से भ्राग्रहू- उत्ति का उदय होता है । स्थानांग सूत्र के द्वितीय स्थात में भग-. बानू महावीर ने बताया है कि धमं के दो पक्ष हैं--एक श्रुत और दूसरा चारित्र । ं श्रुत का अ्थ--ज्ञान है और च 1रित्र का अयें-सदाचार है । ज्ञान के द्वारा विकास और उदृश्यकी खोज करना, प्राप्ति के मागे दूढ़ना और सदाचार का आशय है कि उन सम्यम्मागों पर चलकर लक्ष्य -सिद्धि प्राप्त करना । खोज के लिए प्रकाश चाहिए जिसे ज्ञान देता है और सदाचार से हमें निर्वाण प्राप्त होता है । इसी को श्रुत-ध्मे के सहायक रूप में ग्राम-घर्म, नगर-धम्मं आदि दस भेदोंको भी धर्म का रूप दिया गया है । धर्म का वास्तविक उद्देश्य बहिमुंखता से हमें अन्तर्मुखी बनाना है । हमारा स्वस्व दारीर नहीं बल्कि श्रात्मा है । शरीर का सुख काम्य-सुख है, कितु हमारा अपना सुख काम्य सुख नहीं हो सकता, क्योंकि वह नांश- शील है । इसीलिए जगत्‌ केवे तमाम धमं, जो हमें बलि के हारा स्वर्गीय सुखों का आदवातत बधते है, वे आध्या हिमिक आनन्द के परमोहेश्य को प्राप्त करने वाहे साधको के लिए ध्म . | , 4




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