अकबर की राज्य - व्यवस्था | Akabar Ki Rajy - Vyavstha

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Akabar Ki Rajy - Vyavstha by गोपालस्वरूप भार्गव - Gopalsvaroop Bhargav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अकबर की त्तेमता १३ उस कीं सफलता का मूल कारण उसकी व्यक्तिगत योग्यतां ही थी 1 उसका शरीरं स्वम्थ और फुर्तीला था । उसमें ^चीरता भरी थी । “यकस विरोधियों को हराने के लिए ` अकवर का दृष्टान्त सुलभ देख पढ़ता है !” वह अफ्ीस तो बहुत खाता था; पर उसे मांस खाना नहीं पसन्द था] वह ग्रायः बहुत दूर तक पैदल चला जाता था। विशेषतः जथ किसी पवित्र स्थान को जाना तव तो अच्श्य इ दूर पैदल जाता था। तैराकं ओर घुड्सवार तो वह अव्वल दजे का श । चौगान में वह निपुण था चौर शिकार में दक्ष था । चीतां के माररे मं उसकी चतुराई ओर वीरता की कहानियां इसके प्रमाण हे ।. जहांगीर शपते पिता के विषय में यों लिखता है, “वह छद लस्वाई लिये हुए डील डोल में मध्यम दजे का था । उसका वण गेहुआं था । आँखे और भौंहि काली थीं । उसका शरीर सुन्दर था तथा उसकी चौड़ी छाती ओर लम्बी भुजाओं से उसकी सिंह की सी शक्ति का परिचय सिलता था । नाक के वाईं ओर एक सुन्दर तिल था जिसे लोग धन और भाग्य का चिह्व समते हैं। उसकी ध्वनि उच्च श्रौर चोली. हषजनक थी) उसका आचरण और स्वभाव ओरसो से भिन्न था तथा वदन से दिव्यप्रतापकी मलक देख पड़ती 'थी ।> जो कुछ हो, परः श्रशवर्‌ के साहस श्रौर बीरता पर श्वय होता दैः। लन्‌ १५६६ मे जव सभ्राट खां जमानका पीछा करते करते रायवरेली पहुंचा; तब उसे ज्ञात हुआ कि खां सान गंगा पार करके सालवा या दद्चिण को जा रहा है । इस समाचार को पाकर उससे खां जमान करो पकड़ने का




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