साहित्य की परख | Sahitya Ki Parakh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(६ ) निक मावनाजन्य मेद खड़ा करके उन्दोंने साहित्य से कला का संयोग अनर्थहेतुक धोपित करके सादित्य-समीक्षा से उसके वहिप्कार का शदिश दिया था | श्र इतालवी दाशनिक क्रोचे के सौन्द्य-सिद्धान्तों की मनोनुकूल विकृति करके उन्होंने आई. ए. रिचाडस जैसे मनोवैज्ञा- निक समीक की पुस्तकों में से पूर्व-प्रकस्णु से हटाये वाक्यों द्वारा भारतीय लाक्षणिक ग्रन्थों थी स्थापनाश्रों और वगी करण का पिष्ट- पेपण करवाया था | इस प्रकार ग्रपने मत की प्रशस्ति करके उन्दने ` श्मभिव्यंजनावाद, स्वच्छदतावाद, प्रमाचवाद, मूतिविधानवाद्‌, पावस्तु- वाद रादि साहि.य-कला की ्राधुनिक प्रवृत्तियोंको प्रवाद्‌ श्र वितंडाबाद्‌ कहकर उनकी निंदा की थी । परन्तु उनकी तकंशन्यता इसी वात से मिद्ध है किं उन्दश्रायंसमाजियों की तरह भारतीय-श्रमारतीय के भेद को बेज्ञानिक वहस का निरता स्वीकार करना पड़ा । श्रान्स्टीन का “सापेक्षतावाद” का सिद्धान्त श्रभारतीय है, रतः श्रसत्य श्र श्रम्राह्य दहै--रेखा कने वाले व्यक्ति मे श्रात्म-प्रवंचना की कितनी शक्ति न होनी चाहिये । कविता भारतीय-श्रभारतीय हो सकती परन्तु भौतिक-विज्ञान, रसायन-शास्त्र, बीजगणित या समाज-विज्ञान त्रौर साहिप्यालोचन को किसी देश की भीगोलिक सीसा में नही वाधा जा सकता | श्रधिक से श्रधिक इन चिज्ञानों का सम्बन्ध सांस्कृतिक-युगों से जोडा जा सकता है, परन्तु शुक्ल जी की दृष्टि में ऐसे युगों का युगान्तरकारी चित्र कमी नहीं चन सका । फलतः अपनी तक-शन्यता और दुराग्रद् को ढांकने के लिए उन्होंने अनपेक्षित पार्डित्य-परदर्शन का रूपक रचा | शुक्ल जी के शनुगामी, पार्डित्य का इतना विशाल घटारोप . खड़ा करने में श्रपने को असमधं पाकर और यह देखकर कि प्राचीन श्राचार्यो ने शब्दशक्तिः, रस, रीति, ग्रलंकार के भेदोपमे्दौ की संख्या पहले दी समाप्त करदी रै, कमी शएक्ल्जी के दी तको की आ्रावृतति करते हैं, कमी आधुनिक स्वनाओं में इन भेदोपभेदों के हृष्टान्त




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