ब्रजभाषा के कृष्णभक्ति - काव्य में अभिव्यंजना - शिल्प | Brajbhasha Ke Krishnabhakti-kabya Me Abhivyanjana-shilp

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Brajbhasha Ke Krishnabhakti-kabya Me Abhivyanjana-shilp by Dr. savitri sinha - डॉ. सावित्री सिन्हा

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ ब्रजभावा के कृष्ए-पक्ति काव्य मे श्रमिव्यंजना-शित्प होकर मूतं रूप धारण करती हँ । निम्नलिखित रूपरेवा से विषयवस्तु तथा भ्रमिव्यंजना में मेद की स्थापना पूणं रूप से स्पष्ट हो जायेगी-- कलात्मक प्रक्रिया ग्रमूतं स्थिति वस्तुपरक पक्ष व्यक्तिपरक पक्ष जागरूक प्रयोग ऐन्द्रिय अवचुबोध प्राथमिक द्वारा वस्तुग्रहण कल्पना प्रतीकात्मक श्मूतं चित्रों का निर्माण वमन | भौतिक उपादानं के माध्यम से व्यक्तीकरणा (बौद्धिक कल्पना (ग्रभिग्यंजना) चेतन प्रक्रिया) | | साधन रूप साध्य रूप इस प्रकार सौन्दये-शास्त्र के भ्रन्तगंत काव्य-सम्वन्धी अभिव्यंजना को बौद्धिक प्रक्रिया के रूप में ही ग्रहण किया गया है । भौतिक उपादानों के जिस संगठन द्वारा कवि श्रथवा कलाकार अपने अभिप्रेत की अभिव्यक्ति करता है वहीं अभिव्यंजना है । इन उपादानों में अ्रन्तःस्थ व्यंजक शक्तियों को संकलित तथा संगठित करके कवि श्रपनी भावनाश्रों को श्राबद्ध करता है । इस संगठन द्वारा श्राविर्भूत रूपात्मक विन्यास ही कलाक़ृति का श्रायाम है श्र यही झ्रभिव्यंजना है । काव्य में विषय-वस्तु श्रौर उसके व्यंजक उपादानों का विन्यास इतना संदिलिष्ट होता हैं कि कुछ दार्शनिकों ने उसे पुर्ण रूप से अविभाज्य श्रौर श्रखण्ड सिद्ध किया है । इस क्षेत्र में सर्वे प्रमुख नाम इटली के दाशंनिक बेनेदेतो क्रोचे का है । काव्य विभाज्य है अथवा झविभाज्य इस प्रदन को लेकर हिन्दी-जगत्‌ में काफी वाद-विवाद हुमा है पर हिन्दी के प्रमुख झ्ाचायं श्रालोचकों ने इस प्रइन पर विचार किया है) कान्य में भ्रभिव्यंजना-पक्च का स्वतन्त्र भ्रौर पृथक्‌ श्रस्तित्व होता है यह बात पुर रूप से मान लेने के पूर्व क्रोचे के श्रभिव्यंजनावादः तथा उससे सम्बद्ध मतो का विवेचन समीचीन होगा ।




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