युगचरण दिनकर | Yug Charan Dinakar

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Yug Charan Dinakar by Dr. savitri sinha - डॉ. सावित्री सिन्हा

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० ग्रोर उनकी नौकरी भी बरकरार रही । दिनकर के मन का यह द्वन्द् सामधेनी की एक कविता में अपनी समस्त करुणा, उद्देग और विवशता के साथ व्यक्त हुआ है । एक शोर भारनेय भह- कार तथा भावुक मन और दूसरी ओर जीवन का नग्न यथार्थ, चककी के इन दो पाठे के वीच पिमनी हुई भावनाओं का विश्र इस पकितिया में साकार है-- युगचारश दिनकर बात चोत में वह युद्ध का समर्थन करते ये और कविताएं सरकार के खिलाफ लिखते थे। और दोनो ही क्षेत्रों में उनका उद्देश्य सफल हुआ । एक ओर सर- कार विरोधी रचनाएं लिखने के कारण वे जनता के लाइले बने रहे और दूसरी झो भ्रयोधष ! निःशेष बीन का एक तार था मै ही! स्वभ्‌ की सम्मिलित गिरा का एक हार था मैं हो ! रम तब क्यों बांध रखा कारा में ? कूद আয তুম शखुग से बहने दिया नहीं धारा में लहरो की खरा चोट गरजता, कभी दिलाझों से टकरा कर प्रहुकार प्राणो का बजता ! ५ तव कयो दष्मानं यह जीवन चष्टन सका मम्दिरमे भ्रव त्क बत অনল আলিঙ্গা লীহাজন देख रहा में वेदि तुम्हारी कुछ टिसटिम, कुछ-कुछ ह्रधियारी +, ^ मुझमें जो मर रहो, जगत में कहाँ भारती देसी ? जो झ्रवमानित शिखा, किसी की कहां आरतो वेसी ? र मुँह तब क्यों इस जम्बाल-जाल सें मुझे फेंक सुस्काते हो तुम मै क्या हँसता नरह देवता पुजा का बन सुमनं याल में? रकः क्र में उज्जवल शंख, स्कन्ध परं क




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