भारतीय भाषा - संगम शब्द कोश खंड १ | Bhartiya Bhasha-sangam Shabda-kosh Vol. 1

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Bhartiya Bhasha-sangam Shabda-kosh Vol. 1 by शंकर दयाल शर्मा - Shanker Dalal Shanker

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कोशगत अर्थों में उर्दू शब्दों की तदुवत्‌ वर्तनी का कारण भारत की प्रत्येक भाषा मे अरबी फारसी शब्द प्रबलित है | परन्तु उनके परवारण बदल गये है । अत वे उनरीं उच्चारणो के अनुरूप लिखे जाते है । उर्दू चाहे भारत में उत्पन्न भाषा है परन्तु उसकी शब्दावली में अरची फारसी तर्की आदि के शब्द अधिक है। उसके जन्म काल में उनकी सख्या कुछ कम थी । अब कुछ अधिक है । अरबी फारसी शब्दों के उन्हीं भाषा ओ के अनकल उन्चारणा का व्यक्त काने के लिये पाय भाषा ओ ने अपनी वर्णमालाओ के अक्षरों में कोई विशेष पिरन नहीं बनाये । परन्तु देवनागरी वर्णमाला का जो रूप डिंदी प्रदेशों में चलता है उसमे क ख ग ज फ के नीचे विदी लगाकर क ख ग ज फ बना लिये है । इनक दारा अरती फारसी और तदनुकूल उर्दू भी शुद्ध बोली जा सकती है । सत्ता बे से पहले यदि कोई हिन्दी लेखक कलग ग्वयाल गम जोर फायदा को कलम खयाल गम जौर फायदा लिखता था तो हिंदी समालोचक उसे अनुचित मानता था| पहात्मा गाधी पहले घ्यक्ति थे जिन्होंने मद्रास में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा स्थापित कर हिंदी को साऐे भारत की एक भाषा का दजोी दिया और हिंदी को ग्यतवना सग्राम के कार्यक्रम का एक अधिन्‍न अग वनाया | परन्तु उन्होने सन्‌ 1934 ट८ के आस पास हिंदी का नाम हिन्द्स्तानी और हिंदी की शब्दावली में उद मे प्रचलित शब्दों की सर्वग्राहयता पर बल देना पारभ कर टिया । राजर्षि पुरुषोत्तम दास टन पूर्णतया गाधी जी के अनयायी थे । वे इलाहाबाद के दिंदी साहित्य सम्मेलन संस्था के कर्ण्धार थे । स्यय नौ उन्होंने कालिज की अपिम कक्षा तक फारसी पढ़ी थी । सिने उन्हे कभी जयाहरलानन बोलते नहीं सुना । वे सदा जवाहिर्लाल चोलते थे अर्थात शद्ध फारसी उन्दारण करते थे ॥ उदार ड्रॉप्लि कोण रखते थे | परन्तु हिन्दी-साहित्य सम्मेलन में हिन्दुस्ताना नास के प्रति विरोधी प्रतिक्रिया हुई । परिणासत हिंदी से प्रलित अरबी -फारसी अधवा कहा जाय नो उद में प्रचलित चदवत रनचारणा का तीव्र बाशियकार आरभ रआ । मैन देखा 1 जन नेता कितना विवश होता है । टन जी हिंदी के पक्षधरो को साथ रखना चाहते थे अत ये लोगो का पक्षपान पूर्ण व्यवदार से न रोक सके । रस समय एक नया शब्द चला हिदीकरण अथातू असरती फारसी शन्दों का कलम स्वयान गम जोर फायदा आरईि रूप हिस्दीकरण हे । अपने पक्ष में तक प्रस्तुत किया गया था कि अगेजी भी भारतीय शब्दों का उच्चारण अपनी प्रकृति के अनुकूल उन्हें वटल कर करती है । हिंदी एसा क्यों न करे | इस आदोलन का केन्द्र इलाहाबाद था । उसी इलाहाबाद के विश्वविद्यालय से एक सम्मान्य प्रोफेसर थे डढा८ बनी प्रसाद । जिन्होंने उक्त आदोलन से कुछ ही वर्ष पूर्व अग्रेजी के गढ़ लन्दन मे गुजरी एक आपचीनी का लेख लिखा था । जिस पर किसी ने ध्यान नहीं टिया । बेनी प्रसाद पी एव डी करने लग्दन गये थे । इलाहाबाद में एम एए करने के बाद उन्होने यहा पुस्तक लिस्वी थीं । सुन रखा था कि ब्रिटिश म्यूजियम क॑ पुस्तकालय में भारत में छपी सभी पुस्तकें उपलब्ध होती है । जिज्ञासा शान्ति के लिये वे उस पुस्तकालय में गये । उन्टोने देखा कि कि लेखकों के नाम क्रम में वेनी प्रसाद नाम है परन्तु उसके आगे लिखा है देखिये वेणीप्रसाद के अन्तर्गत । विश्व विद्यालय में पढ़ते हुए उन्हें यह ज्ञान था कि अंग्रेजी लिखने की प्रधा में व्यक्ति का जन्ममिद्ध अधिकार है कि वह अपने नाग को किसी भी वर्णक्रम या स्पेलिंग मे लिखे । वे उच्चतम कक्षा तक विश्वविद्यालय में पढ़े युवक थे । वड़े जोश और आक्रोश में उन्होंने अपना यह तर्क पुम्तकालयाध्यक्ष क॑ सामने प्रस्तुत किया । पुस्तकानयापध्यक्ष एक विद्वान अंग्रेज थे । उन्होने उत्तर दिया निश्चित 16




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