विमोचन | Vimochan

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Vimochan by चक्रवर्ती राजगोपालाचर्या - Chkravarti Rajgopalacharya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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माघव को ज्ञान हुआ । ७ दूसरे दिन भी यही बातें होतीं । “ भाई, आभो चर '' कहु कर सोमू दरवाज़ पर आ खड़ा होता और माधव को बुढाता । माघो अपना काम बन्दकर अपने दोस्तों के साथ हो लेता । रामू अपनी बेटी बही को बुखाता । बली डिब्बी लाकर उसके सामने रख देती । _ रोज़ की तरह रामू उसमें ४ आने डाल देता और बढ़ी फिर उसे उठा ` <>] कर्‌ रत देती । उधर माधो भी अपनी आदत के माक्षिक तादी की दृकान मँ जाकर ४ आने पैसे देता ओर तादी लेकर आंख मूद पी जाता। इसी तरह दिन बीतते जाते थे । रामू की स डिब्बी पैसे से भरती जाती थी । माधो की कमाई के पैसे रोज़ ¢ आने के हिसाब से ताड़ी की दूकान पर पहुँच जाते थे । उधर माधो पछताता कि वह ४ आने से ज्यादा ताड़ी पर खच कर नहीं कर पाता ! इधर बल्ली अपनी डिब्बी को पैसे से भरा देख खूब खुश होती । माधो की प्यारी वस्तु ताडी उसके पेट म अपना काम करने र्गी । सुबह उठते ही उसका सिर दर्द करने ठगता । आंखें छाल होती जाती थी। वह हमेशा शराबी की तरह बकता रहता । घर में अपनी मां और स्त्री से हर हमेशा झगड़ता । बाज़ार से ज़रूरी चीजें खरीदने के 'लिये तंगी हमेशा बनी रहती थी । इसतरह बारह महीने बीत गये । एक दिन सुबह को माधो की बूढ़ी माँ घर का आंगन साफ़ कर द्वार पर श्चाद् दे रही थी । रामू कहीं से एक सुन्दर गाय को छिये हुए आया । गाय का छोटा बछड़ा अपनी, मां के चारों तरफ़ उछठ रहा था ।




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