आत्म चिन्तन | Aatm Chintan

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चक्रवर्ती राजगोपालाचर्या - Chkravarti Rajgopalacharya

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मार्कस ऑरेलियस - Marcus Aurelius

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२पुरुष माने जाते हैं, कहा. है कि मार्कस ऑरेलियस की इस पुस्तक से कई ने उद्धार पाया है। इस आत्मचिन्तन से हमें राग-देष-रहित सच्ची तपरचर्या का तथा विवेकयुक्त गाहेस्थ्य-जीवृन का उपदेश मिलता है। सुख और दुःख मनुष्य के अपने ही हाथों में हैं । सुख-दुःख की अवस्था आन्तरिक है, वाह्य नहीं | इसी को मार्कस ने कई प्रकार से समझाया हैं। साथ जगत्‌ एक प्राणवान व्यक्ति हैँ, जिसके तुम अंगमात्र हो । जगत्‌ का हितचिन्तन तुम्हारा स्वाभाविक धर्म हे । विवेकपूवेक आचरण करनादही तुम्हारा धर्म ओर उसीमें तुम्हारा कल्याण हुँ। व्यक्ति के लिए कोई घटना दुःखरूप होने पर भी समष्टि के लिए लाभदायक ही होती है । इसलिए चाहे कंसे ही कंष्ट का सामना करना पड़े, चित्त को स्थिर रखना चाहिए । इन वातों को विस्तार से समझाकर मार्कस अपने मन को धीरज और समाधान देते हैं । मन की अविचलल अवस्था को ही उन्होंने इंश्वरभक्ति ओर आनन्द कठा हं । साधारण मनुष्य इस आनन्द को साहस के साथ के प्राप्त करे, इसका मार्ग राजयोगी मारकंस ने दिखाया हैं ।चक्रवर्ती राजगोगालाचार्य




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