खालिक बारी | Khalik Bari

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Book Image : खालिक बारी  - Khalik Bari
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जन्म:-

20 सितंबर 1911, आँवल खेड़ा , आगरा, संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश भारत (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत)

मृत्यु :-

2 जून 1990 (आयु 78 वर्ष) , हरिद्वार, भारत

अन्य नाम :-

श्री राम मत, गुरुदेव, वेदमूर्ति, आचार्य, युग ऋषि, तपोनिष्ठ, गुरुजी

आचार्य श्रीराम शर्मा जी को अखिल विश्व गायत्री परिवार (AWGP) के संस्थापक और संरक्षक के रूप में जाना जाता है |

गृहनगर :- आंवल खेड़ा , आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत

पत्नी :- भगवती देवी शर्मा

श्रीराम शर्मा (20 सितंबर 1911– 2 जून 1990) एक समाज सुधारक, एक दार्शनिक, और "ऑल वर्ल्ड गायत्री परिवार" के संस्थापक थे, जिसका मुख्यालय शांतिकुंज, हरिद्वार, भारत में है। उन्हें गायत्री प

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ८ )समाश्रों में श्ररनी गायकी से सप्राद्‌ श्रौर सामंतों को चकित कर दिया | सातवीं सपा में श्रमीर खुसरो भी श्रपने शिष्यों के साथ उपस्थित हुए ! नायक गोपाल खुसरों की संगीतज्ञता से परिचित था । उसने खुसरो से कुछ गाने के लिये कहा । अमीर खुगरों टाल गए । बोले --'मैं मुगल हूँ, हिंदुस्तानी संगीत का सेर ज्ञान श्रल्प है । पढले श्राप सुनाये फिर मैं सुनाऊँगा ।' नायक ने गाना गाया तो खुषरों घोले--'मैं यह राग गा चुका हूँ ।' श्रमीर ने वह राग गाकर सुना दिया । गोपाल ने दुसरा राग गाया । खुदरो ने वह भी माकर सुना दिया | श्रत में खुबरो ने नायक से कहा--'श्रबर तक श्ापने बाजारू तौर धिते पिटे गाने गाद हैं । मेरा साना सुनिए ।'खुतरो ने गीत गाया । नायक गोपाल मुग्ध हो गया ।अमीर खुसरो ने तुर्की, ईरानी श्रौर भारतीय संगीत के समन्वय से झ्नेक रागो की उदूभावना कौ जिनमे कौल, तराना, खयाल, नकश, निगार, चसीत, तलाना श्र सोहेला सुख्य है । वारौ मे समन्प्रय का प्रय किया गया | वीणा को सितार में परिवर्तित करने का श्रेय खुसरो को दिया जाता है ।कब्बाली के विन्यास का श्रेत्र भी खुसरो को है । कब्वाली की विशेषता यद है कि उममे श्रबी, इंरानी श्रौर उत्तर भारतीय संगीत का श्रच्छा मिश्रण हुआ है। कव्वाली म शरोता एक देण *लोकघुन सुनता है तो दूसरे ही क्षण शानज्नीय दंग का श्रालाप ।फारसी के महान्‌ कवि होते हृष्ट भी खुषरों ने हिंदी का महत्व स्वीकार किया था | खुसरो ने श्रज्ाउद्दीन खिलजी के पुत्र खिज़्खों श्रीर उत्की प्रेमिका देवल देवी के संबंध में 'खिज्नामः'-- प्रेमकाब्य लिखा है। इसमें एक स्थान पर खुमरों ने हिंदी की प्रशंसा लिखी है । इस प्रशंसा का सार इसप्रकार है-धनै मूल मे था, पर श्रच्छी तरद सोचने पर हिंदी भाषा फारसी से कम नहीं ज्ञात हुई । श्री के सित्रा, जो प्रत्ये। माषा की मीर श्रोर सर्रों में मुख्य है, रई ( श्ररब का एक नगर ) श्रौर रूम की प्रचलित माषं समने पर दिंदी से कम मालूम हुई ।' '*हिंदी भाषा भी श्रमी के समान है, क्योंकि उतरे भी मिलावट का स्थान नहीं है ।'हिंदी श्रोर उदू दोनों भाषाश्रों के साहित्येतिहास में श्रमीर खुसरो को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । श्यामसु दरदास के विचार में खुसरो खड़ी बोली के




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