सत्य हरिश्चन्द्र | Sataya Harish Candra

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
246
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[ ७ |
बनी--कठिन श्रम उठाना स्वीकार किया “ˆ ˆ` उपेक्ला, धृणा, कष्ट
सब कुछ- अपने आशा-घन रोहित पुत्र को सामने रख कर
सहने का श्रत लिया । भविष्य की कल्पनाएँ उसके साथ हैं--कभी
रोहित उसका उद्धार कर सकेगा” ”*' मगर भाग्य-चक्क में रोहित भी
असमय उसका साथ छोड़ देता है, काल-सपे का कठिन प्रहार
सुकुमार बालक नहीं सह सका। माता का हृदय एक बार दी
विदीशे हो गया--उसकी यह चीत्कार-
हा रोहित, हा पुत्र ! अकेली छोड़ मुझे तू कहाँ गया ?
में जी कर अब बता करूँ क्या ! लेचल मु फको ज गया ।
पिछला दुख तो भूल न पाई, यह श्रा वज्र नया द्रटा।
तारात् निभौगिनि कैसी, भाग्य स्वेथा तव एटा ॥
- की ध्वनि-प्रति ध्वनि किसी भी हृदय को कंपित कर देने मे समर्थं
है मगर दिज-पुत्र को इससे क्या, तारा उसकी दासी है उसे सुख
पहुँचाने के लिए, श्रपने रुदन-स्वर से उसका हदय दुःखित करने
के लिए नहीं । वह चिल्ला पड़ता दै--
रोती क्यों है ? पगली हो क्या गया ? कौन-सा नभ टूटा,
बालक ही तो था दासी के जीवन का बन्घन-छूटा। -
१... ॐ (
क्या उपचार ! मर गया वह तो भृत भी क्या जीवित होते?
हम स्वामी दासों के पीछे द्रव्य नहीं अपना खोते ।
यह स्वामित्व, मानवता के लिए कितना बड़ा श्रमिशाप है? ओह !
हरिश्चन्द्र का चारित्रिक “क्लाइमेक्स' कुफन कर वसूल
करने में हमारे सामने श्राता है--सेवक का कतेव्य वदद नहीं छोड़
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