संस्कृत काव्य के विकास में जैन कवियों का योगदान | Sanskrit Kavya Ke Vikas Men Jain Kaviyon Ka Yogadan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Sanskrit Kavya Ke Vikas Men Jain Kaviyon Ka Yogadan by डॉ. नेमिचन्द्र शास्त्री - Dr. Nemichandra Shastri

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about डॉ. नेमिचन्द्र शास्त्री - Dr. Nemichandra Shastri

Add Infomation About. Dr. Nemichandra Shastri

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
दो शब्द १५ चतुर्थ परिषर्तमें इतरमामाम्त महाकाब्योंके क्रममें धर्मशर्माम्युदय, नेमिनिर्वाण, जयम्तविजय, पस्ानन्द भौर भरनारायणानन्द सहाकाव्योंका परिदीलन प्रस्तुत किया गया है । इस परिवर्तकी प्रमुख विशेषता उपमानोंके वर्गीकरण और चयनकी है। भपरस्तुर्लोका स्रोतमृरक विश्लेषण करते हुए अग्नि, अन्बकार प्रकाश, शस्वास्त्र, आकाश, प्रसाधन सामग्री, अंगोर्पाग कोटपतंग, खनिज-घातु, गुहोपकरण, ग्रह-नक्षत्र, भलचर, जंगली पशु, दिक्‌, देश, दिव्य-पुरुष, दिश्यपद्यार्थ, धार्मिक वस्तु, नर-नारी, मूप-असात्य, पयोद, पर्वत, पक्षी, पुष्प-पत्लव, रोग, ओषधि, लता, वृक्ष वीरुष, समुद्र, सरोवर, सरीसूप, पुराण, बाइमय आदि चौंतीस वर्गोंमें विभक्त किया है । काव्यात्मक अतुशी लग- को दुष्टिसे इस परिवर्तमें कई विशेषताएं प्राप्त होगी । पंचम परिवर्तमें सन्धान और ऐतिहासिक सहाकाव्योके अध्ययनके साथ अभि लेसीय काग्योंका भो परिशीलन किया गया है । इस परिवतमें काव्यात्मक अनुचिन्तनके साथ ऐतिहासिक मूस्योंको भी स्थापना को गयो है। ऐतिहासिक और अभिठेखीय काब्य रसोदुबोधनकी दृष्टिसि जितने महत्त्वपूर्ण होते हैं, उससे कही अधिक ऐतिहासिक दृष्टिसे । कवि ऐतिहासिक तथ्योंकी योजना संवेदनाओं और मावनाओके परिपादवमें करता है, जिससे ऐतिहासिक तथ्य भी रसात्मक रूपमें परिणत हो जाते हैं । षष्ठ परिवर्तमें एकार्थ, लघु, सन्देश, सूक्ति एवं स्तोत्र-काव्योका परिलीकन किया गया है । छत्रचूडामणि, पार्डवाम्युदय, यदयोषरचरित, महोपालचरित, जैनकुमार- सम्भव, नेमिदूत, पवनदूत, शोलदूत, सूक्तिमुक्तावलो, सुभाषित रत्नसन्दोह, भक्तामर- स्तोत्र, एकी भाव, विषापहार, कल्याण मन्दिर, भूपाल चतुविशतिका एवं वैराग्यशतक आदिके काव्याट्मक मूल्योका उद्घाटन किया गया है । सप्तम परिवर्तमें संस्कृत जैन काब्योंमें प्रतिपादित सौन्दर्य, जोवनभोग दार्शनिक और धामिक विचारधारा, आध्यात्मिक अनुभूति, सस्कृति भौर सामाजिक जीवनं तथा आधिक भौर राजनीतिकं विचार एवं कला-कौशल आदिका अध्ययन किया है । इस प्रकार इस ग्रन्थमें जैन संस्कृत काव्योका सर्वागीण अध्ययन करनेका प्रयास किया गया है। इस प्रयासमें कहाँ तक सफलता प्रात हुई है, यह तो सुधोवर्गके ऊपर ही छोड़ा जाता है । पर इस प्रयासमें जिन महानु मावोंसे सहयोग प्राप्त हुआ है, उनके प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करना अत्यावश्यक है । सर्वप्रथम मैं अपने निदेशक डॉ. श्रो हीरालालजों जैनके प्रति नतमस्तक हूँ, जिनकी मावयित्री और कारयित्री प्रतिभासे मुझे संबल प्राप हुआ भौर यह प्रयास सफल हो सका । अतः मैं पुनः-पुन: परम श्रद्धेय ड. जैनके प्रति अपनो कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ । प्रकाशना शेय भारतोय जशानपीठ काशोके अधिकारी एवं उसके सुयोग्य मन्ो धो बाबू लक्ष्मी चन्द्रजी जैनको है, जिनकी महनोय अनुकम्पासे यह शोध-प्रबन्ध जिशासुओंके समक्ष प्रस्तुत हो रहा है । बन्घुवर श्रो डॉ० गोकुलचन्द्रजी जैनको भी नहीं




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now