कबीर साखी - संग्रह | Kabir Sakhi - Sangrah

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Kabir Sakhi - Sangrah by पं. महवीर प्रसाद मालवीय Pt. Mahavir Prasad Malviya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गुरुदेव का संग ऐसा ऐसे ते. सतयुरू सब ही जग सीवल कया सतगरू हम से «-रीसि बरसा बादल प्रेस का के उपदेस का जा सतणरु नहीं जम ट्वारे पर ठूत सब, ' विन वे कबहूं न छटदता चार खान से करसता -सेो ता फेरा सिंदि गया 1 सीचा व्यापं सहीं चल कबीर वा देस से काल के साथे चाँव दे साहेन अंक पंसारिया सतगुरु साँचा. सूरमा, लागत ही मय सिटि गया, सतगुरू बाहर घाव न. दीसईं, सतगरु सब्द कमान कि एक जा दबाहा प्रेस से व. । सौंत । १ चलाया । छाई ना मिला, से पं 3... # वी ३८ तन मन सेँपे सिरण ज्यीँ, सिले, 'कीतर सतत लास का सीत ॥ सुने बिक का गीत जिन से रहिये लछाग । जब सिटी आापनी एक कहा. परसंग । फींजि गया सब ऊंग ॥द६९॥ सुनिया एक बिचार ॥ जाता जम के ट्वार ॥०७०॥१ करते खींचा ताल । फिरता चारा खानि ॥०९॥ न लहता पार । सतणरुू के उपकार ॥७९॥ सवा न स॒निये काय जहूँ बैदा सतगरू हाय ॥०३॥ सतगरु. के उपदेस । ले चला अपने देख सब्द जा एक पड़ा नख सिख सारा पुर चकनाचूर बाइन लागा तोर सीतर लिधघा सरीर अँकबार यानी दाने 980 पट 991] सट्टा दानेों हाथ 1




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