आर्य्य सिद्धान्त विमर्श | Aryya Siddhant Vimarsh
श्रेणी : धार्मिक / Religious, पौराणिक / Mythological

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
21 MB
कुल पष्ठ :
488
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१० प्रथम आआय-विदत्सम्मेलनअर्थो' में नहीं, बल्कि विशेष अ्थो' में आता है। क्योंकि
वह् नियमबद्ध ओर संगठनशील समाज है । इसके अपने
मोलिक नियम ओर सिद्धान्त हैं । इनके मानने वाले ही इस के
सभासद रह सकते हैं । समाज शास्त्र के विद्वान इस बात को
अच्छी तरह जानते हैं कि भिन्न-भिन्न अथवा विरोधी विचारों-
वाले मनुष्यों के समूह से कभी कई नियमबद्ध और संगठनशील
समाज बन ओर संगठित रह दही नहीं सकता, ओर न इनकी
अधिक से अधिक संख्या होने पर भी इनका कोई सामाजिक बल हो
सकता है । चाहे वह सोशल, पोलिरिकल ओर धामिक, कोई
भी समाज क्यों न हो, केवल निशित मन्तव्य ओर कतव्य ही
है जो किसी नियमबद्ध समाज को वना, दृढ और संगठित रख
सकते हैं। यह तो हो सकता है कि कोई नियमबद्ध संगठन-
शील समाज भी अपने किसी नियम व सिद्धान्त को अशुद्ध
और अनुपयोगी जान कर बदल दे, परन्तु यह कदापि नहीं हो
सकता कि भिन्न-भिन्न तथा विरोधी विचारों वा निश्चित मन्तव्यों
के रखन वाले परस्पर संगठित रह कर किसी नियमबद्ध समाज
को बना ओर संगठित रख सके । यरि केवल आचाग्पद्धति
के अनुकूल आचारण अथवा सदाचार को ही आयसमाज के
सभासद रहने का नियम मानेंगे, तो इस नियम की अतिव्याप्नि
संसार भरके मत-मतन्तगों में रहने बाले सदाचारी मनुष्यां
मे हो जायगी, क्योकि आयसमाज की आचारपद्धति
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