जयशंकर प्रसाद | Jayshankar Prasad

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
176
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भूमिकामैंने कामायनी की श्रालोचना मे यह दिखाने की चेषटा की हैं कि उनकी
इष्टि समन्वय चाहती है, श्र वे संघपत्मिक जीवन-दर्शन के श्रनुयायी नदीं
हैं| अ्व मेरे सहदय और विचक्षण काव्यपारखी मित्र श्री इलाचन्द्र जोशी
श्रद्मा और इड़ा के प्रतीकों-द्वारा व्यंजित दो जीवन-दृष्टियों को विरोधी शिविरों
में रखते हैं और श्रद्धा को श्रतिशय कल्याणीया, अनन्त करुणामयी, मगल-
अभिषेकमयी श्रादि कदकर ग्रहण करते हैं श्रौर इड़ा को उन्मत्त-लालसा-
प्र्वालिनी,; अनन्त-य्रदृप्ति- दायिनी श्रादि रूपों में देखते हैं. किन्तु इसी
'उन्मत्त-लालसा-प्रज्वालिनी” को मनु पने पुत्ररत्न की सददचरी बनाते हैं |
स्पष्ट ई कि प्रसादजी सभ्यता के इस बुद्धिवादी विकास कों लांछिंत नददीं करते
न उसकी वास्तविकता से ग्रं मते, किन्तु वे एक समन्वय-सू्र हमारे
सामने रखना चादते ई |
इस्त सवध मे मुभे श्रपने मित्र, हिन्दी के सुपठित मनोविष्लेघक श्र काव्या-
लोचक श्री नसेत्तमप्रसाद नागर की उद्भावना शधिक उपयुक्त प्रतीत हुई |
वे पूछते हैं, श्रद्धा करणामयी कहाँ है--जब्र कि वह इतनी असहनशील है ?
इड़ा यदि नारी होने के कारण ही उन्मत्त-लालसा-प्रज्वालिनी हो, तो इसमें
उसका क्या दोप श्रौर श्रद्धा करा भी यदी स्वरूप ८ वचिं इसे श्रघिक उन्मन
लालसामय ) पुस्तक के प्रारंभिक सर्गों में देखा जा सकता है | इड़ा तो मनु
को सच्छिक्षा दी देती है, उस वेचारी का श्रपराध क्या हैं ?
मनु श्रोर इड़ा के संवंध को प्रसादजी ने मनुपुत्र तौर इड़ा के संबंध मे
परिणत कर दिया है। इससे इड़ा का त्याग नहीं, ग्रहण ही सिद्ध होता है ।
दाँ, प्रसादजी का मनु को श्रद्धा के साथ एकान्त मानस-प्रदेश की आर ले
जाना आर वहाँ भाँति-भाँति के दृश्यों के बीच (कमः, भावनाः और “चेतना!
के तीन गोलक दिखाना तथा उनके वैषम्य को मिटाकर उन्हें समन्वित कर
देना प्रसादजी के ससन्वयवाद का द्योतक है । वैज्ञानिक प्रगतिवाद की दृष्टि
से प्रसादजी यहीं प्रवुत्तिमूलक वैज्ञानिक श्रौर वौद्धिक विचार-धारा से प्रथक
हो गए हैं । किन्तु मेरा यद कहना है कि बुद्धि की अति और उसके श्रवद्य-
म्मावी विकारों का. दो प्रतिवेध प्रसाइजी ने किया दै और यह उनकी मूल
श्राव्यात्मिक विचारणा के श्रनुकूल ही है ।
वेज्ञानिक संघर्पात्मक -प्रवत्ति-दर्शन दी श्राघुनिक प्रगतिशील साहित्य
मूल में है | प्रसादजी इस दर्शन के साथ सारी दूरी तक नहीं जाते किन्तु इस१३
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