सूर पूर्व व्रजभाषा ओर उसका साहित्य | Soor Poorva Brijbhasha Aur Uska Sahitya
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
278
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)प्रास्तातिक११. विक्रम की स्रइवीं शतान्दी के पूवां म बजभापा में अत्वन्त उच्चकोटि के
सादित्य फा निमाण हुआ । रेता समभा जाता है कि केन पचास पो में इस मापा ने अपने
सादित्य की उककृ्टता, मधुरता ओर प्रगल्मता के बल पर उत्तर भारत की सर्वश्रेष्ठ भाषा का
स्थान ग्रहण कर ल्वा 1 भक्ति-आन्दोलन की प्रमुख मापा के रूप में उसका प्रभाव समूचे देश
में स्यापित दो गया और शुजरात से बंगाल तक के विभिन्न मापा-भाषियों ने इसे 'पुसपोतम-
मापा” के रूप में अपनाया तथा इसमें काव्य प्रथयन का प्रयत्न भी क्या । एक भेर महाप्रभु
वल्लमाचार्व ने इसे पुरुषोत्तम भाषा की आदरास्पद् संज्ञा दी क्योंकि यह उनके आराष्य देव
कृष्ण की लन्म-भूमि की भाषा यौ, दूसरी ओर काव्य ओर साहित्य के प्रेमी सुहदो ने इसे
भ्माषामसिः कौ प्रतिष्ठा पदान कौ । डा० ग्रियसन ने दन्दो के अभिजात साहित्य के माध्यम
के रूप में प्रतिष्ठित इस माघा को प्रधानतम बोली ( 131९0105 74८०7४3 ) कडा द ¡ इसे
च 'मर्पोरश ॐ) -्यद्ये माय, सम्दे ‰ ' शयण्डाप चेः चपि, त्वमा, च सष्ठ स्
सौन्दर्य अप्रतिम या । उनडे संगीतमय पदों से आइए होकर सम्राट् अस्वर इस मापा के भक्त
दो गए | डा० चाइय्मों ने इसी तथ्य को ओर संकेत करते हुए लिखा है कि “भर के सदश
एक विदेशी विजेता के दिये जो भाषा केवल मनोरंजन और साहित्यिक औत्सुस्य वा प्रयोग-
मात्र थी चददी उसके भारतोयकृत पौन सम्राट अकबर के काल तक पूर्णतया प्रचखित स्वामाधिक1६15 व. छिप एप छितताता सडह्तें उच धिप्लियध्परट ए घिंड टाउबडाट एल्०त् दत् 15 ४९५०८००य७१त६प्द ६० 0० घिह तडान्टॉ०ड छावच्टफन पते कदर चथीं एड ट०पडातेडस्टर्त 23 धगत ०६
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