सत्यार्थ प्रकाश | Satyarth Prakash

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Satyarth Prakash by दयानन्द सरस्वती - Dayananda Saraswati
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 33.12 MB
कुल पृष्ठ : 633
श्रेणी : ,
Edit Categories.


यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटी है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं |

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

दयानन्द सरस्वती - Dayananda Saraswati

दयानन्द सरस्वती - Dayananda Saraswati के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश (देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
छः नमक मी शक प्रथमसमुझास ॥ व नल पल रब पिन ४. ल भाव तो उसका स्वामी उस पर कुद्ध दोकर कद्देगा कि तू नि्ुद्धि पुरुष है समनसमय मे लवण चार भाजनकाल में घोड़ के लाने का क्या प्रयोजन था ? तू मरकरणवित्तू नह्दीं है नद्दीं तो जिस समय में जिसको लाना चाहिये था उसी को लाता जो तु को प्रकरण का विचार करना छावरयक था वह तूने नहदीं किया इससे तू मुखे है मरे पाप से चला जा । इससे क्या सिद्ध हुआ कि जहां जिस- का प्रदण करना उचित हो वहां उसी अथे का अहण करना चाहिये तो ऐसा ही इस छोर साप सब लोयों को मानना ओोर करना सी चाहिये || ॥ अथ मन्त्राथे ॥ सोइम्‌ खस्व्रह्म ॥ १ ॥ यजुः० अ० ४० । मं० १७॥ देखिये वेदों में ऐसे २ प्रकरणों में झोमू आदि परमेश्वर के नाम आति हू । घ्ोसित्येतदचरसद गीथमपासीत ॥ २ ॥ छान्दाग्य उपानषद्‌ स० १ ॥ ्ोमित्येतद चरसिद ५ सर्व ॥ ३ ॥ मारड्क्य० स० १ ॥ सवे वेदा यत्पदसासनान्त सवाण च यद्ठदान्त । यादच्छ्धन्तां त्रह्मचय्य चरान्त तत्त पद सग्हण ब्रबास्या- सित्येतत्‌ ॥ ४ ॥ कठोपनिषत्‌ । वीं २। स० ९४ ॥ प्रशासितारं सर्वेघामणी यांसमखारॉप | रुक्सामं स्वप्तघीगम्यं विद्यात्त पुरुष परम्‌ ॥ ४. ॥ एतसेके वदन्त्यर्गि मनुमन्ये प्रजापतिम्‌ । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम ॥ ६॥ अभ १२। शलो० १९२ । १९३ थे स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्ररस शिवरसोचरस्त परमः स्वराट। अनन्त कु उन




  • User Reviews

    अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

    अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
    आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :