जैन कथामाला 38 | Jain Kathamala 38

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Add Infomation AboutUpadhyay Shri Madhukar Muni
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2.51 MB
कुल पष्ठ :
95
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ज जन कथामाला : माग ३४
कुछ समय वाद धनना सेठ की दण्डावधि पूरी हुई और वे छोड़
दिये गए । विजय कारागार में ही सड़ता रहा । जब श्र प्ठी घना पर
आधे तो सेठानी ने कोई स्वागत नहीं किया, वह्कि मुंह फुलाकर बठ
गई, बोली भी नहीं । घन्ना को वड़ा दुःख हुआ, पत्नी के इस व्यवहार
से | दुःख के साथ आइवर्य अधिक था । अतः कारण जानने के लिए
वे स्वयं ही सेठानी से बोले--
कद्रा ! इतने दिन वाद कारागार से आया हूँ और हूँ वोलंती भी
नहीं । आखिर चात क्या है ? कुछ बता तो सही ।
सेठानी भद्रा ने वताया--
“मैंने नौ महीने गर्भ में रखा, लालन-पातन किया और मेरे इक
लौते बेटे को विजय ने मार डाला । उसी विजय को तुम अपना खाना
ख़िलाते थे । जाओ, मैं तुमसे नहीं वोलूंगी ।”
सेठजी इस शिकायत पर मुस्कराये और वोले-- दि
अरे पगली ! अगर मैं उसे खाना न ख़िलाता तो जिन्दा करें
रहता ? उसे खिलाना मेरी विवशता थी ।”
सेठ ने पुरी वात बताई और सेठानी को समझाया | सेठानी का
श्रम दूर हो गया । हँसकर वोली--
तो यह बात थी । फिर तो खिलाना ही पड़ता । मैं तो संगध्ी
थी कि कहीं आपका उससे ममत्व तो नहीं है ।”
ममत्व कैसे होता ? क्या देवदत्त मेरा पत्र नहीं था, पर जीवन
रक्षा के लिए ममत्वरहित होकर भी खिलाना ही चाहिए |”
जीवन के उत्तर में धनना श्रेप्ठी ने मुनि धर्मघोप री देगना
सुनी और दीक्षित होकर संग्रम का पालन करने लगे । अस्त में मुर्त
धनना ने संधारा करके धरीर त्यागा और देवलोक प्राप्त किया ।
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