सुन्दरी डाकू या हीरे की खान | Sundari Daku Ya Heere Ki Khan

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Sundari Daku Ya Heere Ki Khan  by पंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा - Pt. Ishvari Prasad Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥) ८ “9 >» ` - सुदर-उवैः आभो} बह्ीदी युक्च बाव है. हौ सैं तुमसे कह छुक्है, तरिकेजी-प्रान्तें मैने खोवेकषी खनको खन करते-करते जो आवि. घकार किया, वह्‌ एकदम कस्पनतीत, खघातीत है! मेरी बात सुनकर तुमने शायद सोचा होगा, किनंने सीनेकी के बहुत बड़ी शान पायी होगी ; पर नहीं, बेटा ! सोना धो श्वीज़ है ? सैंने हरिव्ी खान देखी है। मुझे दीरोकी पहचान है। किम्बा- ऱीकीं ददोरेकी खानोंकी बात तुमने खुनी होगी; पर डीक जावना, यहाँ भी वैसा कीमती हीरा आजतक किसीने नहीं पार्या! क्यों ? बचा तुम्हें मेरी वातष्डा विश्वास नहीं होता? कुछ प्रमाण चाहिये ? अच्छा, मेरी क़मीज़के पाकेटमें हाथ डालो+-जो कुछ भिरे, उसे बाहर निकालों :* सारे ब्लौतूदलके बेवेनसा हॉकर स्पाइक्स-काटर उठा और उस मरखे हुए वूद्धकी चमझडेकी बनी हुई क़मीज़की जेबमें हाथ डालकर पक छोटीसों घेली निकालकर देखने लगा, जिसकी मुँह पक, चमड़ेके फीतिसे बंँधा हुआ था! * . < पा वृह ने कहा,--“थेखी खोऊकर उसके भीतरकी नीज़ देशों £ येखीका सुद्‌ खोल, स्पाइक्स-कार्टरने स्योही सखे दरुटा, स्योंद्दी दस -बारइ चमकते हुए हीरे उसके सामने गिर पड़े । .वे' होरे अच्छी तरह खरादे और साफ़ किये नहीं होनेपर भी इस सरहकी उज्ज्वछ आशा दिखा रहे थे, कि उरक अमक्र लल, रुपाइक्स-कारंर्के चिस्पयकी कोई सीमा न रही} शसने असफुटसरसे कषा--“केसे आश्चर्यकी वात है} यै्क्वा मैं क छ सपनान्दैष् रहा छू २४ ` * . - > न न




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