हिंदी वैद्यकल्पतरु | Hindi Vaidya Kalpataru

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विचार विविधता 1 रद, इसी फारण जगदुत्पन्नस्थावर जंगमके यथाय॑ शुण भी बाधित दोरदे हैं. जिससे प्रयोग, प्रयोगक्ती, प्रयोगभोक्ता सीनोंद्दीयं यदि अव्यदस्था देखी जाय तो क्या असम्भव है? अतः इस समय इससे यदि आप उपयोग ठीक न समझ सके अथवा मे फरसके तो चह विपय प्रन्थसे निकाल देना असय समझकर इसी प्रकार होगा फि जैसे आपका देश अथवा सबे भापाओंकी जन्मदान्री संस्कृत भाषा विद्या । क्योंकि आप हैं कि आपका देश अथवा संस्कृत भाषा विद्या कितनी महत्वपूर्ण ब्यव- खावाठी हैं पर इस समय प्रचारके अभावसे दुबेलद्दीसी प्रतिभात दोरदी दे । क्या आप इन दोनोंको छोड़ देगें ? इसपर आप उत्तर देंगे कि इस समय इनके उत्कपैका समय नहीं है । यदि द्ोगा हो होना सम्भव दे । बस प्रियवर ! यदद न्याय यहांपर भी और उक्त रासायनिक प्रयोग ग्रन्थोंसे करनेकी अभिठापा शिथिठ फीजिये और 'चरक विमानस्थानकों देखिये कि फितना यद्द विचार रददस्यमय है जिसको स्थिर चित्त होकर विचारनेहदीसे पूर्वापरकी धारणाके साथ सिद्धान्त लक्षित शोता दै जो कि देशकाठका धर्म क्तव्यके साथ दीनदद्ध दशा प्रतियुगमं कर्तब्यभष्ट भ्राणियोंकि अनुरूप देशके वायु जठ अम्मि देवस्वरुप यथा शुणकों वितरण नहीं घयोंकि उपदेश सूप्रफा भाव दै कि- बाताज्नलं जलादेशं देशात्कालं स्वभावतः । दिया इपरिशपरतदाद्वरों यः परमायवितू ॥| अयोन्‌ माणियोंकि अनाचारसे जगनूका वायु विरुद्ध शुण दो जठको दूपित रवा दे और व जछ देशकों दूपित परता दे .पुनः इन सपके सम्वन्पसे काछ भी हुए दोफर विरुद्ध शुणमय स्वभावसे पूरक अनिवार्य दान्टुक्त उत्तरोत्तर दनि दशाका पाठ देता हुआ प्राणियोंकों तथा औपषि माय्को रुगदीन थनाकर पूर्ण आयुमे बाधित करता दे जो ऋतुभोंके दिपरीत और न्यूनददीन मिध्यायोगले जानसत्ते दै; जो औपपियां रसायन प्रयोग द्वारा जठ, 'ट्रथिि आदि दोपर पुष्ट दोदी दे दद्द भी इन पंचतरशेंद्ीसे सम्बन्ध रखती हैं और दी रगायन प्रयोग ट्ारा आायुके अधिदतर दोनेमें सदायरू हैं ठो क्यों ऋर गुण ध्ासके यही नी; किन्तु और भी इस दिपयमें निपमित जाहा ै दि. पूर्गे दादि सम्दन्मर: सपमू । बदले य ॥ भाव जिर युग जो आयु निपत की यू है इसोदे अजुसार रे भरी भाप हत दर झादु शोना निदह है; परन्तु झद देर्यनिये रूप रद दै दि




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