पंपयुग के जैन कवि | Pampayug Ke Jain Kavi

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
169
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)রি =
কীন্ধিগ্ধ পথ হিনদনাতুনানিঅঘক্কা आधार व्यासका महाभारत और
आदिपुराणका आधार आचार्य जिनसेनका संस्कृत आरिपुराण ই |
ऊपर में कद चुका द्र कि विक्र गाजंनविजय सामन्त ऑरिकेसरीको
स्वय कर क्षे लिखा गया था | ऑरिकरेसरी वैदिक मतानुयायी
था | माद्म ह्वोता है मि. इसीलिए जेन मतानुयायीं द्ोकर भी
पपने ब्यासके मद्दामारत क्षो ˆ क्रमाजुनविजयका आधार माना |
ए रि भी कबतिने द्रौपदीको एचफतनो न मानकर जन मात्यतानुप्तार
বিদ্ধ अर्जुनकी द्वी पत्नी माना दे | इससे आगे चठकर पंपकों कुछ
अद्ुषरिधार्ं उपत्थित नक्ड्य इई } फिर भी यह अपने सिद्रान्तसे
विचलित नहीं हुआ | जैन तम्ाजमें महापुराणका स्थान बहुत
ऊंचा दे | इसके रचयितः आ्तार्व जिनपन सामान्य कवि नहीं
ये } (हिन्दी विश्वफोष' » ।बहाने संपादकके मतसे जिनसेनकी
कवित महाकवि काठिदा ०, कततिते कि्ठी मी दृष्टिते कम नही
वै । बल्कि कदी-कहौ उप्ते भी बटर * | আন্না? जिनसेनका
पाश्रीम्युदय (काब्य) सेल्कृत सादिय-भाण्डारमें एक बेजोड रत्न है।
प्रद्वापुराणक्ी गंभीर वर्णनरेलीसे प्रसन्न दो कर ही पंपने उसे
अपने आरिपुराणक्रा ~, चार माना होगा । पंपने आदिपुराणे
छिर्फ कथातारकी है -श छिया है; भाव एवं जहा तद्या वचन
तथा परयोंकी छाया भी । कुछ भी हो, पंपका आदिपुराण एक सर्व-# इस च 'दिन्दी विश्वकोषः परे जिनतेन शब्द दष्टम्प दे |
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