पंपयुग के जैन कवि | Pampyug Ke Jain Kavi

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Pampyug Ke Jain Kavi  by के० भुजबली शास्त्री - K. Bhujwali Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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রি = কীন্ধিগ্ধ পথ হিনদনাতুনানিঅঘক্কা आधार व्यासका महाभारत और आदिपुराणका आधार आचार्य जिनसेनका संस्कृत आरिपुराण ই | ऊपर में कद चुका द्र कि विक्र गाजंनविजय सामन्त ऑरिकेसरीको स्वय कर क्षे लिखा गया था | ऑरिकरेसरी वैदिक मतानुयायी था | माद्म ह्वोता है मि. इसीलिए जेन मतानुयायीं द्ोकर भी पपने ब्यासके मद्दामारत क्षो ˆ क्रमाजुनविजयका आधार माना | ए रि भी कबतिने द्रौपदीको एचफतनो न मानकर जन मात्यतानुप्तार বিদ্ধ अर्जुनकी द्वी पत्नी माना दे | इससे आगे चठकर पंपकों कुछ अद्ुषरिधार्‌ं उपत्थित नक्ड्य इई } फिर भी यह अपने सिद्रान्तसे विचलित नहीं हुआ | जैन तम्ाजमें महापुराणका स्थान बहुत ऊंचा दे | इसके रचयितः आ्तार्व जिनपन सामान्य कवि नहीं ये } (हिन्दी विश्वफोष' » ।बहाने संपादकके मतसे जिनसेनकी कवित महाकवि काठिदा ०, कततिते कि्ठी मी दृष्टिते कम नही वै । बल्कि कदी-कहौ उप्ते भी बटर * | আন্না? जिनसेनका पाश्रीम्युदय (काब्य) सेल्कृत सादिय-भाण्डारमें एक बेजोड रत्न है। प्रद्वापुराणक्ी गंभीर वर्णनरेलीसे प्रसन्न दो कर ही पंपने उसे अपने आरिपुराणक्रा ~, चार माना होगा । पंपने आदिपुराणे छिर्फ कथातारकी है -श छिया है; भाव एवं जहा तद्या वचन तथा परयोंकी छाया भी । कुछ भी हो, पंपका आदिपुराण एक सर्व- # इस च 'दिन्दी विश्वकोषः परे जिनतेन शब्द दष्टम्प दे |




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