शेष वाणी | Shesh Vani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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সমান £रोगशय्या : गद्य-काव्य १४ओर न समकेगा कुछ ~धविस्म॒त युगर्मे दुलेभ प्षणो्मि जीवित था कोई शायद,हमें नहीं मिली जिसकी कोई खोज उसीको निकाला था उसमें खोज ।कलकत्ता १३ सतेग्बर्‌ “४०१९१जगतमें थुगोंसे हो रही जमासुनीत अक्षमा 1अगोचरमें कहीं भी एक रेखाकी होते ही भुछ दीर्थ कालमें अकस्मात्‌ अपनेको कर देती वह निर्मूल । नींव जिसकी धिरस्थायी सम रखी थी मनम লী उसके हो उठता है भूकम्प परल्य-नेतेनभे । प्राणी कितने दी अये ये बाँधफे अपना दल जीवनकी रफ्रभूमिपरअपर्याप्त शक्तिका लेकर सम्ब-बह शक्ति ही है श्रम उसका,अऋमशः असद्य दो छुप्त फर देती मद्दामारकों । कोई नहीं जानता,इस विद्म कहाँ हो रही जमादारुण अक्षमा ।दृष्टिकी अतीत न्नुटियोंका फर भेदनसम्बन्धके दृट्‌ रा्धका कर्‌ रही वह छेदनं ; इन्नितके स्फुलिह्वोंका भ्रमपीछे लौसतेका पथ सदाको कर रहा दुर्गम्‌ ।




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