शिक्षा में विवेक भाग - १ | Shiksha Me Vivek Bhag - 1

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
160
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)शिक्षाका दर्शन १३
करना चाहे, तो आप बूचे-नीचे या आगे-पीछे तो हिल सकते हे, परन्तु
प्रगति नही कर सकते।
जिस प्रकार आत्मा-अनात्मा-विवेकर्मे केवर दोके वीचकीं
विलक्षणता ही समन्लने जैसी चीज नही, बल्कि दोनोके वीचका गाद्
अन्वय भी ध्यानमें रखना आवश्यक है।
लेकिन दोनोका खयारू रखनेवाले भी दोनोंके परस्पर ओत-
भरोत सम्बन्यका खया रखना भूल जाते हैें। आध्यात्मिक जीवनका
क्षेत्र अठऊग है और भौतिक जीवनका अलग है; सेकका विचार करते
समय दूसरेको भूल जानेमें वे कोठी दोष नहीं देखते; आलटे, जेकर्मे
दूसरेको मिला देनेवाके दोषपात्र माने जाते हें। गाघीजी पर छगाया
जानेवाला यह आक्षेप तौ जग-जाहिर है कि जुन्होने सत्य, अहिसा
आदि आध्यात्मिक जीवनके गुणोको भौतिक क्षेत्र्में दाखिल करके बड़ी
अव्यवस्था पेदा कर दी है। अूसी प्रकार जेसे लोगोको भौतिक
विद्याकी खोजोका अनुसरण करके बध्यात्म-न्ञानके क्षेत्रमें आनेवाले
विषयोका संशोधन करनेमें भी अमुतनी ही अरुचि रहती है। विज्ञानकी
परयोगदाखामे व्याख्यान देनेवाला चास्त्री मौर मदिरे भ्रवचन करनेवाला
शास्त्री --दोनों अेंक ही व्यक्ति हो तो भी अुसका व्यवहार दो
अलग-अलग व्यक्तियोकी तरह रहता है। यह भी शरीर और आत्माके
वीचका अन्वय न समझनेंका परिणाम है ! जैसा कि आचार्य जैदसने
कहा है:
“ मनुष्यकी सर्वांगीण शिक्षा साधनी हो, तो सबसे पहले हमें
भूतकालसे च्छे आ रहे जक हानिकारक अमको दूर करना होगा।
वह भ्रम जिस मान्यते है कि मनुष्य शरीर और मन जिन दो
अलूग-अलूग तया जैसे-तैसे जुडे हुओं अंगोंका वना हुआ है। जिन दोमें से
वादमें मनरूपी अंशको ही दैवी मानकर आअसका शिक्षाके क्षेत्रमें समावेश
किया जाता है। परन्तु शरीरको जिहलौकिक पाथिव वस्तु मानकर
शरीर-विज्ञानियों या डॉक्टर-वैद्योके लिझे छोड़ दिया जाता है। जिस
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