जवाहर किरानावली अनाथ भगवान खंड | Javahar Kiranavali Anath Bhagwan Khand-1

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Javahar Kiranavali Anath Bhagwan Khand-1 by आचार्य जिनविजय मुनि - Achary Jinvijay Muni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ७ ) यहाँ यह प्रश्न दो सकता है कि सिद्ध भगवान्‌ अगर मांगलिक हँ तो बड़े बड़े महात्माओं को रोग और दुःख क्‍यों सहन करने पड़े ९ गज़सुकुमार मुनि के मस्तक पर घघकते हुए अंगार रक्खे ग़ये और दूसरे महात्माओं को भी अनेक दुःख सहन करने पड़े। षदं सिद्धो की मांगलिकता क्रयो काम न आई 0 इस प्रश्न का उत्तर भर है कि मंगल का अर्थ पाप को नाश करने वाला द्वोता है । आर कष्ट देने वाले पर कष्ट सहन करने वाले को देष उत्पन्न शो तो उससे मंगल नहीं है। हों, अगर देप का भाव उत्पन्न न हो तो मंगल समभना चाहिए। गजसुकुमार सुनि के मस्तक पर द्हकते हए अंगार सोमिल ब्राह्मण ने रखे, परन्तु उन सुनि ने सोमिलको शतु नहीं माना, अपने में मंगल जगाने वाला मित्र माना | इ प्रकार सिद्ध भगवान्‌ भावमङ्गल दै । आप द्रव्य मङ्गल देखते ह । जिनमे भाव-मागलिकता ই; ই লজ का चमत्कार भी दिखला सक्ते हैं, किन्तु वे महात्मा ऐसा करने की इच्द्धा नहीं फरते। वे तो आत्मा की शान्ति की ही रक्षा करना चाहते हैं:। अगर वे किसी प्रकार का द्रव्य ने चमत्कार बताने के इच्छुक होते तो घक्रवर्ती का राज्य और सोलह-सोलह हजार देवों की सेवा क्‍यों त्याग देते | और क्यों संयम को धारण करते ? जहाँ देवता सेवक बन कर रहते हों वहाँ द्रव्य चमत्कार में क्या कमी रह सकती है | किन्तु सत्य तो यह है कि ऐसे महात्मा इस प्रकार के चमत्कार पी च्छा दी नदीं करते । जैसे को$ सूर्य की पूजा करता है और कोई सूयै को गाली देता है । मगर सूये गा्लियां देने वालि पर र्ट होकर उसे कम प्रकाश नहीं देता और पूजा करने वाले पर तुष्ट হী




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