मृणालिनी | Mrinalini 

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पं. रूपनारायण पाण्डेय - Pt. Roopnarayan Pandey

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बंकिम चन्द्र - Bankim Chandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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- सृणालिनी | | | {९ फिर सुन पड़ा-- वृन्दावनधनः, गोपिकामोहनः =; . काहे तुम त्यागी रे १ देश देश पर, सो श्यामसुन्दर, क्‍ तुब हित फिरे बड़भागी रे।... मृणालिनी ने गआवेग के साथ कहा--सखी ! सखी ! उसे . घर के भीतर बुला लाओ | ' मणिमालिनी गयिका को बुलाने गद । उधर वह गने लगी- फूले ই नलिन, यमुना-पुलिनः बहुत पिपासा रे, प्वंद्रमाशालिनी, ये मधुयामिनी, मिटी नहीं आशा रे | इसी समय मशणिमालिनी उसे बुलाकर घर के भीतर ले. आई । गायिका पहले ही के सिलसिले में गाने लगी--- द रनि रस-भरी, कहो तो सुन्दरी, ` कहाँ मिले देखा रे । सुन जाओ चलि, वाजे रे मुरलि, . घन-घन एका रे | मृणालिनी ने उसते कहा--वुम्दाया रला दहत मीठा दै | तुम इस गीत को फिर गाघ्रो | यहाँ गायिका को रूपरेखा का कुछ घणुन कर दिया जाय। उसकी : . अवस्था यही सोलह साल को होंगी | घह प्रोडशीं ठिगने कद की ओर ` कृप्णवर्ण थी। उसका रंग पक्का काला होने पर भी ऐसा काला नथा कि उसकी देह पर अगर মীহা ইভ जाता লী दिखाई न पढ़ता, अथवा शरीर प स्याही पोतने से यह जान पड़ता कि उसने पानी से नहांया है, या पानी : से नहाने पर जान पड़ता कि उसने स्याही पोत ली है । जैसा काला रंग अपने घर मैं होनें पर हम. .उसे -साँवला या श्यामवर्ण कहते दे शरोर पराये घर . में होने पर उसे कोयले-सा .काला .कहते है, वेसा दी इसका ऋब्णवर्ण था | /




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