स्वर्गीय जीवन | Swargiya Jeevan

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Swargiya Jeevan by सुख सम्पतिरय भण्डारी - Sukh Sampatiray Bhandari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जे पहला भअध्याय 1 भर नशा सिंड नडीं डोतो कि, सनुष्य जितनाहो इस परमात्स-जोवनकी ओर भुकता है उतना हो वद परसात्म-जोवनके नजदीक भ्राता जाता है और जितनाहो नज्ञदोक श्वाता जाता है उतनोदो परमाकाकों शक्तियों उसमें प्रकट होने लगती हैं। जब ईखरीय शक्तियाँ असोम चर अनन्त हैं, तो इसका श्रगुसव वारनेमें सनुष्य को जो विध्न जान पड़ता है उस विश्न का पैदा करनेवाला भी वच् स्वयं है, क्योंकि ऊपर कड़े इए सत्यका उसे ज्ञान नदीं है। पचले मतपर विचार कोजिये।. अगर परमात्मा सबके पीछे रहता इुधा अनन्तजौवनवालो आत्मा हो कि, जिसमसेंसे सब उत्पन्न हो सकते हैं ; तो फिर इमारा व्यक्तिगत जोवन इस अनन्त जौवनमेंसे दिव्य प्रवाइ दारा निरन्तर बढ़ा करता है। यदि इस दूसरे मतके श्रहुसार विचार करें और यछ मानें कि, इमारो व्यक्तिगत आत्मा इस परसात्माका भअंशर्प है, तो फिर हमारा व्यक्तिगत रुपमें प्रकट इधा जौवन अपने सूल अनन्तजोवनके सट्थ होगा। लेसे समुद्रसे निकाला हुआ जल विन्दु-खरूपमें घौर लक्षणमें अपने स्ूल ससुद्रके ऐसा डोता है, वेसादी हाल इसारे व्यक्तिगत जीवन चौर अनन्त- जोवनके विषयमें समझना चाहिये । इस स्थानपर भ्रूल होना सम्भव है। यदापि परसात्म-जोवन और व्यक्तिगत जोवन सरूपमें यकसां है, तथापि. अनन्त-जोवन व्यक्तिगत लौवन' से इतना उत्क,छ हैं कि, उससें सचका समावेश हो नाता है!




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